Sunday, December 04, 2016

देशभक्ति का मौसम


मौसम तीन तरह के होते हैं- जाड़ा, गर्मी, बरसात। जाड़े में सर्दी पड़ती है। गर्मी में गरम हवा चलती है। बरसात में पानी बरसता है। लेकिन यह तो शुद्ध मौसम की बात है। आजकल मिलावट का जमाना है। हर तरफ़ मिलावट हो रही है। ईमानदारी में बेईमानी, राजनीति में धूर्तता , देशभक्ति में गद्दारी, सफ़ेदधन में कालेधन की इतनी महीन मिलावट होने लगी है कि पहचानना मुश्किल होता है। इसी तरह मौसम में भी मिलावट होने लगी है। कब जाड़े में पानी बरसने लगे कहना मुश्किल। जाड़े में कब पंखे चलने लगें यह भविष्यफ़ल बताने वाले भी नहीं बता पाते।

प्रकृति के बनाये मौसमों के अलावा इंसान ने भी कई मौसम अपने हिसाब से बनाये हैं। इनमें देशभक्ति का मौसम सबसे प्रमुख होता है। हर देश में यह अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। जैसे जापान में मजदूर लोग नाराज होते हैं तब उत्पादन बढा देते हैं। लेकिन अपने यहां नाराजगी का इजहार काम बन्द करके और कहीं-कहीं बना हुआ सामान जलाकर करते हैं।

अपने देश में देशभक्ति का मौसम कई तरह से मनाया जाता है। अलग-अलग तबके के लोगों के अपने-अपने अंदाज हैं।
टाप क्लास की देशभक्ति ऊपर के 1% तबके की होती है। इनके कब्जे में देश के 90%  संसाधन होते हैं। वे लोग जो कुछ भी करते हैं वही देशभक्ति होती है। उनकी हर लीला देशभक्ति है। उनके द्वारा की गई हर लूटपाट, गड़बड़ी, गद्दारी को देशभक्ति के खाते में जोड़ा जाता है। इनकी देशभक्ति के हाथ कानून के हाथ से भी लम्बे होते हैं।  देशभक्ति के काम में सहयोग के लिये वे सरकारों को काम पर रख लेते हैं। सरकारें  उनकी देशभक्ति में  सहायता करती हैं। जो सरकार उनकी देशभक्ति में अड़चन डालती है उसको वे  बदलवा देते है। इनकी देशभक्ति का डंका हर तरफ़ बजता रहता है। इनके लिये हर मौसम ’देशभक्ति का मौसम’ होता है। इसकी ’देशभक्ति का मौसम’ रंगीन, खुशनुमा, जायकेदार और आनन्ददायक होता है।

दूसरी तरह की देशभक्ति वह तबका मनाता है जो आबादी में 30-35% होगा। देशभक्ति का सबसे ज्यादा हल्ला यही तबका मचाता है। देशभक्ति के काम में आसानी के लिये सरकार को देश समझ लेता है। हल्ले में इजाफ़े के लिहाज से यह तबका खुद को दो भागों में बांट लेता है। एक सरकार समर्थक हो जाता है। दूसरा सरकार विरोधी। दोनों मिलकर देशभक्ति का हल्ला इत्ती जोर से मचाते हैं कि देश सुने तो बहरा हो जाये।  समर्थक तबका सरकार के हर कदम का समर्थन करता है। सरकार उनकी गर्दन काटने के लिये अध्यादेश लाये तो वे भारत माता की जय कहते हुये उनका समर्थन करते हैं। नोटबन्दी का मसला हो या सर्जिकल स्ट्राइक का किसी भी सवाल उठाने वाले को  देशद्रोही मानता है।


समर्थक लोग दिल लगाकर समर्थन करते हैं। नोटबंदी का समर्थन करने वाला दलाल कमीशन पर पुराने नोट बदलते हुये भारतमाता की जय का नारा लगाता है। ड्राइंगरूम में वन्देमातरम चिल्लाता है तो बीबी समझ जाती है 500 रुपये की गड्डी बदली। इंकलाब जिन्दाबाद सुनती है तो कहती है- ’आज 1000 के नोट बदलने वाले बहुत आ रहे हैं।’

बीच के तबके के लिये ’देशभक्ति का मौसम’ सरकार की हरकत निर्भर करता है। सरकार कोई कल्याणकारी काम करती है तो सरकार विरोधी तबका उसकी खिलाफ़त करते हुये ’देशभक्ति मनाने’ लगता है। सैनिकों के भले के लिये कोई स्कीम आती है तो जी भरकर सरकार की लानत-मनालत करता है। सीमा पर गोली खाने वाले सैनिक की तरफ़ खड़ा होकर सरकार के खिलाफ़ बयान देता है और नींद की गोली खाकर सो जाता है।

यह बीच का वर्ग  ’देशभक्ति का मौसम’ इतने बहुरंगी तरीके से मनाता है कि सच्ची में लगता है कि भारत विभिन्नता में एकता का देश है। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग विचार वाले लोग अलग तरह से राय रखते हैं। कोई बहस करता है। कोई तर्क-कुतर्क का सहारा लेता है। आमने-सामने होने पर जिन्दाबाद-मुर्दाबाद भी होता है। उत्साह में आने पर मारपीट भी हो जाती है। गाली-गलौज का मुजाहिरा करते हुये अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़े रहते हैं लोग। गाली-गलौज में मां-बहन करते हुये बताते रहते हैं कि देश नारियों के सम्मान के लिये कितना हलकान रहता है।

इन दोनों तबको के अलावा तीसरा तबका है। आबादी में सबसे बड़ा। औकात के लिहाज से सबसे गरीब। ऊपर के दोनों के तबके इस तबके की भलाई के नाम पर इसकी ऐसी-तैसी करते रहते हैं। सरकारें इसकी भलाई के लिये काम इस तरह काम करती रहती हैं, इसको पता ही नहीं चलता। देश इसके भले के लिये बहस करता रहता है, इसको सुनाई ही नहीं देता। देश इसको मुख्यधारा में लाने का हल्ला मचाता रहता है। हर हल्ले के साथ यह तबका देश की मुख्यधारा से और दूर धकिया दिया जाता है। इस तबके के लिये  ’देशभक्ति के मौसम’  का कोई मतलब नहीं होता। इसके लिये हर मौसम बदरंग और  बेईमान है। हर मौसम में भकुआया रहता है यह तबका। जब कभी वह लोगों को देशभक्ति की बात करता सुनता है तो इसका मतलब समझ नहीं पाता। ’देशभक्ति का मौसम’ कैसा होता है उसको पता ही नहीं है। 

जिसके लिये जिन्दा रहना ही चुनौती हो उसके लिये ’देशभक्ति का मौसम’ कोई मायने नहीं रखता।

जाड़े के मौसम में बिस्तर पर कम्बल ओढकर  यह लिखते हुये देख रहे हैं कि विद्याबालन अपनी पिक्चर का प्रमोशन कर रही हैं। प्रधानमंत्री जी देश के लिये लाइन में लगे रहने वालों की तारीफ़ कर रहे हैं। घरैतिन थोड़ा ना नुकर के बाद एक बार से चाय पिलाने की बात पर सैद्धान्तिक रूप से सहमत हो गयी हैं।  कुल मिलाकर इधर मौसम में जाड़े, सौन्दर्य, देश और घर की  ’कातिलाना मिलावट’ है।  ’कातिलाना मिलावट’ बोले तो ’डेडली कम्बीनेशन’।

आपके उधर मौसम कैसा है?



  

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Sunday, November 06, 2016

बुलेट ट्रेन के युग में लबढब व्यंग्य लेखन

अजीब बवाल है यार है। यही दिन देखने को बचे थे। लिखने के पहले विषय तय करना पड़ेगा। ये तो ऐसा ही हुआ जैसे अपने घर में परिचय पत्र दिखा के घुसने को मिले। अपन तो जो मन आये लिखते हैं। आदतन उल्टा-पुल्टा। ईरान की बात को तूरान से जोड़ते हैं। मीडिया में हालिया चलन वाले शब्द यहां-वहां घुसा देते हैं। अपनी गरीबी की बात लिखकर थोड़ा रोना टाइप। दूसरों की अमीरी के किस्से थोड़ी हिकारत के साथ। नेताओं का जिक्र गाली के साथ। तकनीक का तफ़सरा बुड़बकपन के साथ। विनम्रता का चित्रण अक्खड़पन के साथ। अपन तो ऐसे ही बिनते हैं ताना-बाना!


ओत्तेरी की। विसंगति को तो भूल ही गये थे। अच्छा हुआ याद आ गया। व्यंग्य मतलब विसंगतियों का चित्रण। बिना विसंगति के व्यंग्य उसी तरह फ़ीका लगता है जैसे बिना गुंडों-बाहुबलियों के कोई लोकतांत्रिक सरकार। फ़िर वापस लौटते हैं। लिखे हुये वाक्यों तोड़ते-मरोडते हैं। सीधा समझ में आने वाली बातों को उलझाऊ बनाते हैं। उसमें विसंगतियां घुसाते हैं।


अब आप विसंगति का मतलब पूछेंगे क्या? पूछेंगे तो बताना ही पड़ेगा। लेकिन आप मोटा मोटी यह समझ लो कि अपने देश में विसंगति का मतलब है बिना गढ्ढे की कोई सार्वजनिक सड़क होना। बिना लिये दिये आपना ड्राइविंग लाइसेंस बनना। बिना जाम का कोई शहर होना। बिना प्रदूषण की दिल्ली होना। बिना उकसावे के किसी देशभक्त का बयान होना। बिना राजनैतिक पहुंच वाले किसी शरीफ़ और विद्वान व्यक्ति का किसी विश्वविद्यालय का कुलपति होना।


लेख में विसंगति घुसा के सांस ले ही रहे थे कि स्मृति ( अरे वो वाली नहीं भाई) ने टोंक दिया कि व्यंग्य में करुणा की अंतर्धारा भी होनी चाहिये। अब ये नया बवाल। करुणा कहां से लाई जाये। कित्ती करुणा मिलायी जाये? असली बंधानी हींग की तरह कोई असली करुणा भी मिलती होगी। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि लेख बिना के करुणा के लिख दिया जाये और फ़िर पैकिंग करुणा के कागज से कर दी जाये। खैर करुणा को छोडिये अभी। करुणा तो अपने यहां इफ़रात में पसरी मिलती है। जिधर देखो उधर करुणा ही करुणा दिखती है। अपने खिलाफ़ हुई साजिश के किस्से सुनाता हर बड़ा लेखक करुणा का चलता-फ़िरता इश्तहार लगता है।


हमसे एक पाठक ने पूछा – “भाईसाहब आप अपने हर अटपटे लेखन को व्यंग्य क्यों कहते हैं? अपने बेवकूफ़ी के लेखन को जिसे आप व्यंग्य लेखन कहते हैं को अगर परिभाषित करने को कहा जाये तो कैसे करेंगे?”
मन तो किया कि पाठक को जबाब देते हुये रोने लगें। अपनी व्यंग्य साधना का इतना मार्मिक वर्णन करें कि वह दहल जाये। इत्ता रोयें कि देखकर उसके मन में मेरे प्रति करुणा पैदा हो जाये जिसको इकट्ठा करके दो-चार व्यंग्य लेख निकाल लें हम। बाकी चलते समय उसी को ’सप्रेम भेंट’ कर दें। लेकिन फ़िर हम किये नहीं। यह उन बड़े लेखकों को शोभा देता है जिनकी तमाम किताबें छप चुकी होती हैं, जिनको खूब इनाम मिल चुके होते हैं। हमको तो कोई दूसरा क्या , हम खुद ही लेखक नहीं मान पाते।


हमने अपने पाठक को प्यार से निहारते हुये बचपन में सुनी एक सब्जी बेंचने के लिये निकली स्त्री का सौंदर्य वर्णन सुनाया:
शकरकंद सी शकल बनाई
गाजर की पैजनियां
आलू के दो बन्द लगाये
ठुमक चली काछिनिया।
अपन का व्यंग्य लेखन इसी तरह का है। अखबार/टीवी में जैसे ही कोई खबर मिली उसको लपक लिया। थोड़ा अंग्रेजी मिलाई ताकि युवा पीढी पढ सके। आगे बढते हुये शब्दों के अनुप्रासिक श्रंगार किया। हट,पट, सट,खट,लट, झट। आओ,जाओ, भगाओ, पटाओ, दिलाओ। अबे, तबे, सबे, क्यों बे, हां बे, ना बे, फ़ूट बे।
किसी भी पढे-लिखे लेखक के लिये ’अनुप्रासिक श्रंगार’ का लालच सहज होता है। चाट के ठेले के पास से गुजरते हुये बतासे खाने की सहज इच्छा की तरह। ’शब्दों की ड्रिबलिंग’ में लेखक इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि अपना गोल किधर है यही भूल जाता है। इसी चक्कर में कभी अपने ही गोल पोस्ट में गेंद घुसा देता है। जब तक उसे होश आता है तब तक खेल खत्म होने का सीटी बज जाती है। ऐसे लेखक के यहां से लेख निकलता है तो देखते ही पता चल जाता है कि सीधा ’अनुप्रास ब्यूटी पार्लर’ से मेकअप कराकर आ रहा है।


कभी-कभी मन में विसंगतियों पर इत्ता गुस्सा आता है कि मन करता है एकदम सर्जिकल स्ट्राइक कर दें उनके खिलाफ़। ऐसे में जित्ती भी विसंगतियां सामने दिखती हैं उन सबको एक सिरे से गरिया देते हैं। कुछ इस तरह जैसे हर बड़ा लेखक अपने अलावा बाकी सारे लेखन को ’लगभग कूड़ा’ बताते हुये अपना बड़प्पन सुरक्षित रखता है। कभी-कभी तो इत्ता जोर से हड़काते हैं विसंगतियों को कि बेचारी सहमकर रोने लगती हैं। कभी-कभी मन करता है कि व्यंग्य में सपाटबयानी व्यंग्य सम्प्रदाय, सरोकारी व्यंग्य सम्प्रदाय, गाली युक्त व्यंग्य सम्प्रदाय के साथ एक ’वीरगाथा व्यंग्य सम्प्रदाय’ का चलन भी होना चाहिये।


इतना लिखने के बाद लगता है कि व्यंग्य लेख पूरा हो गया। परसाई जी की परम्परा से सीधे जुड़ गये। परम्परा से क्या जुड़े उनसे आगे का लेखन कर रहे। परसाई जी के जाने के बीस साल बाद कुछ लिखना उनसे आगे का ही लेखन हुआ न! भले ही देश दुनिया की समझ उत्ती भी न हो जितनी परसाई जी को साठ साल पहले थी।
अब जब लेख पूरा हो गया है तो इसका शीर्षक भी तय करना जरूरी है। वैसे शीर्षक तो पहले ही तय है- व्यंग्य का विषय क्या हो? इसके अलावा अगर हमसे किसी लेख का विषय तय करने को कहा जाये तो हम इस तरह के शीर्षक सुझायेंगे:


1. बुलेट ट्रेन के युग में लबढब व्यंग्य लेखन
2. एवरेस्ट से उतरकर कूड़ा बीनता व्यंग्य लेखक
3. शब्द अनुप्रास की फ़िसलपट्टी पर झूलता लेखक
4. व्यंग्य के मठाधीशों का करुणा आख्यान
5. व्यंग्य के देवालय में चिरकुटई साधता लेखक
आपको कौन सा शीर्षक पसंद आया? आप भी कुछ सुझाइये!

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Saturday, November 05, 2016

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था

आज सबेरे जल्दी ही ’हकाल’ दिये घर से। घरैतिन को लगता है दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये। लगता तो हमको भी है लेकिन अपन का आलस्य से गठबंधन कुछ ऐसा कि लगते पर अमल अक्सर छूट जाता है। हर काम ’अंतिम समय पर’ करने के आदत। वो शेर है न नूर साहब का:

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था
इसीलिये सफ़र न कभी सुमार करता था।

मतलब इतना विश्वास है कि कल्लेंगे कभी काम। हो जायेगा। लेकिन घरैतिन का हिसाब अलग है । काम करना है तो अभी कर लो वर्ना छूट जायेगा।

बहरहाल जल्दी निकलने का फ़ायदा हुआ। तसल्ली से नजारे देखते हुये आये। घर के बाहर ही तीन महिलायें भी काम पर जाती दिखीं। वे भी लगता है जल्दी ही निकली थीं क्योंकि वे भी नजारा देखते हुये तसल्ली से बतियाये हुये जा रहीं थी।

आर्मापुर बाजार में गन्ने बिक रहे थे। छठ पर्व के लिये। पन्द्रह रुपये का एक गन्ना था। अभी तो ये शुरुआत थी। जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा दाम सेंसेक्स सरीखे उतरेंगे-चढेंगे। बिकने के लिये तैयार गन्ने बड़े खूबसूरत लग रहे थे। जैसे डिग्री मिलने पर कालेंजों में नौकरी के लिये जाते बच्चे सामूहिक फ़ोटो खिंचवाते हुये हसीन लगते हैं वैसे ही गन्ने भी क्यूट लग रहे थे।

हमने गन्नों की फ़ोटो लेने के लिये खिड़की खोली गाड़ी की। धूल गाड़ी में घुसकर गुडमार्निंग करने लगी। गाड़ी में पहले से मौजूद धूल ने उसको बैठने की जगह नहीं दी तो बाकी की फ़िर आयी नहीं। सूरज की किरणें भी खिलखिलाते हुये घुस आईं और चमका दी गाड़ी।

हमारे फ़ोटो लेने तक वे तीन महिलायें आगे आ गयीं थीं। क्लिक करते ही कमरे के सामने आ गयीं। हमने फ़ोटो दुबारा लिया। उनको अंदाजा हो गया था कि वे कैमरे के सामने आ गयीं थीं। वे मुड-मुडकर हमको देखने लगीं। हमने सोचा हम भी देख लें लेकिन फ़िर नहीं देखा। देखने लगते तो देर हो जाती।


सड़क पर एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ चला जा रहा था। कुत्ते का अगला पैर शायद चोटिल था। अगला एक पैर जमीन से कुछ इंच ऊपर उठाये कुत्ता सड़क पर कर रहा था। आने-जाने वाले हरेक को सलाम करता हुआ कुत्ता संस्कारी कुत्ता लग रहा था। संभव है किसी बकैत कुत्ते का चौकीदार हो वो कुत्ता और उसकी सेवा शर्तों में आता हो कि जब तक यहां रहोगे आसपास तब तक अगली टांग हमेशा सलाम मुद्रा में रखनी होगी।

पता नहीं कुत्तों के यहां यह लंगड़े कुत्तों को दिव्यांग कहने की व्यवस्था लागू हुयी कि नहीं। लागू हो गयी होगी तो उसको लंगड़े की जगह दिव्यांग ही कहना होगा। न कहें तो क्या पता कोई कार्रवाई हो जाये अपने ऊपर तो अपन माफ़ी मांगते घूमें। क्या पता सजा ही हो जाये कि एक दिन पोस्ट नहीं कर पाओगे अपना रोजनामचा। हम तो अपील भी न कर पायेंगे। न अपना कोई अखबार है न कोई टीवी चैनल।

’श्वान चिन्तन’ करते हुये पलक झपकते जरीब चौकी के पास पहुंच गये।’पलक झपकते’  से बेहतर होगा कहना ’पलकें झपकाते’ हुये। एक ठेलिया पर एकदम लाल युवा टमाटर बिक रहे थे। इत्ते क्यूट और स्वीट लग रहे थे टमाटर कि मन किया गाड़ी वहीं ठेलिया के पार ठढ़िया कर प्यार कर लें टमाटरों को। लेकिन मुये दफ़्तर की याद ने फ़िर दौड़ा दिया आगे।

बाजपेयी जी मिले। जाड़े में उनकी ड्रेस बदल गयी है। गरम कोट पहने थे। हमने कहा नई ड्रेस बढिया है तो बोले -’ हां बुकेट प्रूफ़ है।’ सीना खुली ड्रेस को बुलेट प्रूफ़ ड्रेस बताते हुये बाजपेयी जी की बात सुनकर ऐसा ही लगा कि जैसा अपनी आबादी के बड़े हिस्से को भूख से बेहाल देश के नेता विकास की दौड़ में सबसे आगे बताते हुये लगते हैं।
बाजपेयी जी ने कहा -कोहली को पकड़वाओ। वो अपनी मां के साथ मिलकर बच्चों को उठवा रहा है। पाकिस्तान के शरीफ़ से बात करके उसको पकड़वाओ।
एक मानसिक रूप से असंतुलित आदमी को सुनकर लगता है कि देखो इस आदमी को अपनी चिन्ता नहीं है। समाज की चिंता है। तमाम बुद्धिजीवी जिनको तमाम उपलब्धियां हासिल हो चुकी होती हैं अक्सर रोते हुये दिखते हैं -हाय हमको ये इनाम नहीं मिला, वो सम्मान नहीं मिला, ये इज्जत नहीं मिली,वो अपमान हो गया। उनसे भले तो अपने बाजपेयी जी हैं जो कभी अपना रोना नहीं रोते।
आगे एक आदमी दूसरे के कन्धे पर हाथ धरे चला जा रहा था। लग रहा था मित्रभाव मूर्तिमान टहल रहा है सड़क पर। भाईचारा जिन्दगी में बाकायदा आबाद है।
ओवरब्रिज के पहले एक लड़का सड़क पर तेजी से भागता गाड़ी के सामने निकल गया। दोनों हाथ चकरघिन्नी की तरह तेजी से घुमाता हुआ भागता बच्चा सड़क की दूसरी तरफ़ जाकर खेलने लगा।
दस साल के करीब से निर्माणीधीन ओवरब्रिज अपने पूरे होने के इंतजार में बाट जोह रहा है। उसके आखिरी छोर पर कपड़ों की फ़ेरी लगाये हुये बैठे लोग शायद सोच रहे होंगे कि यह पुल ऐसा ही अधबना बना रहे ताकि अपनी दिहाड़ी चलती रहे। उससे ज्यादा तो शायद पुल के बाद बना मंदिर का पुजारी सोचता होगा कि पुल बना तो मंदिर टूटेगा। कमाई बंद होगी। क्या पता मंदिर के पुजारी ने ही कुछ तगड़ा चढ़ावा चढाकर पुल की फ़ाइल रुकवा दी हो।
यही सब फ़ालतू की बातें सोचते हुये समय पर नहीं समय से बहुत पहले पहुंच गये और दिन भर के लिये जमा हो गये।
आपका दिन चकाचक बीते।

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Friday, November 04, 2016

हर तरफ मंगतों का हुजूम है

किरन और करन
शाम को जब दफ़्तर से घर लौटने पर अक्सर ही टाटमिल चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल की मेहरबानी से कुछ रुकना होता है। गाड़ी रुकते ही लपककर कोई न कोई गाड़ी पोंछने लगता है। मना करते न करते सामने का शीशा पोंछ डालता है। कुछ न कुछ आशा करता है। कभी-कभी कुछ फुटकर रूपये दे देते हैं। कभी बत्ती हरी होती है तो फूट लेते हैं।

जब पैसे नहीं देते तो लगता है अगले की मजूरी मारकर फूट लिए हैं। कभी मना करते हैं तो कहता है मर्जी हो देना नहीं तो मत देना। मानों उसकी सफाई न हुई जियो का मुफ्तिया सिम हो गया। अब्बी मुफ़्त है। बाद में मन करे तो जारी रखना, न मन करे तो बन्द कर देना।

एक दिन सिग्नल देर में हुआ तो बतियाने भी लगे। भाईसाहब गाड़ी पोंछते जा रहे थे जबाब देते जा रहे थे। बताया कि तीन-चार घण्टे 'सफाई सेवा' प्रदान करके 40-50 रूपये जुटा लेते हैं।कभी कोई देता है कभी नहीं भी देता है (कहते हुए उसने हमारी तरफ देखा)। कभी कोई पांच-दस भी दे देता है। कभी एकाध में टरका देता है। जिसकी जो मर्जी हो देता है , हम ले लेते हैं।

ये तो हुई बात कुछ करके कुछ पाने की आशा रखने वाली बात। दूसरी जमात में वे लोग हैं जो बिना कुछ किये कुछ चाहते हैं। जरीब चौकी क्रासिंग पर ऐसे तमाम बच्चे सक्रिय हैं। क्रासिंग पर गाड़ी रुकते ही खिड़की पर जुट जाते हैं। कुछ लोग कोई फोटो भी पकडे रहते हैं। खासकर शनिवार को एक बाल्टी में लोहे की पत्ती तेल में डुबाये हुए। तेल भी क्या पता तेल होता है या कोई मोबिलऑयल पता नहीं।

भीख मांगने वालों की उपेक्षा करके बचना तो आसान होता है। कभी उनकी फोटो खींचने की कोशिश करते हैं तो भाग जाते हैं। लेकिन अफ़सोस बहुत होता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी बच्चे पैदा होते ही मांगने के धंधे में उतार दिए जाते हैं। जिस उम्र में किसी स्कूल में होना चाहिए उनको उस आयु में चौराहे पर हथेली फैलाये मिलते हैं।

स्कूल जाने वाले बच्चे भी कभी-कभी यह एहसास कराते हैं कि अभाव और गरीबी हमारे अंदर मांगने की आदत के इंजेक्शन लगाती रहती है।

एक दिन घर से निकलते ही दो बच्चे मिल गए। पता चला पास के स्कूल में पढ़ते हैं। नौ बजे का स्कूल है। आठ बजे तैयार होकर भाई बहन चल दिए स्कूल। भाई करन 4 में पढ़ता है। बहन किरन 2 में शायद। कुछ गिनती पहाड़े पूछते हुए हम आगे बढ़े तो बच्चे ने कुछ पैसे मांगे। हमने पूछा क्या करोगे ? बच्चा बोला - चिज्जी खाएंगे।

यह बात जब तक हुई तब तक हम गाड़ी स्पीड में ले आये थे। बच्चे की मांग में भी , शायद आदत न होने के चलते, थोड़ी हिचक सी थी। कुल मिलाकर हम कुछ दिए बिना आगे बढ़ गए।

यह तो अबोध बच्चे थे। लेकिन आसपास देखते हैं तो लगता है चारो तरफ मांगने वालों का हुजूम हैं। कोई सुविधा मांग रहा है तो कोई रियायत।कोई वोट मांग रहा है तो कोई नोट। कोई अपने लिए जबरियन उपहार मांग रहा है तो कोई आरक्षण। कोई यश और सममान के लिए कटोरा थामें खड़ा है। हर तरफ मंगतों का हुजूम है। हम भी किसी न किसी रूप में इसी जुलूस में कहीं शामिल हैं।

शायद  हम मंगते समाज के रूप में विकसित हो रहे हैं। मांगने वाले बढ़ रहे हैं देने वाले घट रहे हैं। सन्तुलन गड़बड़ाएगा तो बवाल होगा ।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10209563771944615&set=a.3154374571759.141820.1037033614&type=3&theater

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Wednesday, October 12, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक पर ताजा खबरें

हरिभूमि 12.10.16


आम गृहस्थ के लिये घर के पचास काम होते हैं। 49 टरका भी दो एक तो बच ही जाता है। निकलना ही पड़ता है घर से बाहर 'सर्जिकल स्ट्राइक' के लिए।

अब ये ससुर 'सर्जिकल स्ट्राइक' भी इतना पॉपुलर हो गया है कि आदमी निपटने भी जाता है तो कहकर जाता है – “तू बैठ ज़रा अपन अभी शौचालय से 'सर्जिकल स्ट्राइक' करके आते है।“

'सर्जिकल स्ट्राइक' में पड़ोसी देश के कितने आतंकवादी जन्नत में हूरों से मिलने निकल लिए इसकी तो संख्या में मतभेद हैं लेकिन इस 'सर्जिकल स्ट्राइक' के हल्ले में तमाम जरूरी लगने वाले मुद्दे उबलती हुई कड़ाही से कोल्ड स्टोरेज में जमा हो गये। वे मुद्दे ऐसे निपट गए कि उनके शव तक न खोजे मिलेंगे।

जनता को भी इसी बहाने एक नया शब्द मिला -सर्जिकल स्ट्राइक । महीने में एकाध बार इसी तरह नए-नए शब्द उछलते रहे तो पांच साल का समय सीखते हुये ही बीत जाएगा। सरकार अपनी उपलब्धियां बताते हुए कहेगी -'हमने अपनी जनता को सबसे ज्यादा नये शब्द सिखाये। हमने सबसे ज्यादा जुमले जोड़े। बोलो जोड़े कि नहीं।'

इस सवाल के जबाब में जनता झकमारकर हाँ कहने के सिवा और क्या कर सकती है ।

हमारे एक मित्र हैं। उन पर आदतन विपक्षी दल की आत्मा सवार रहती है। हर बात का स्टीयरिंग गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी की तरफ़ मोड़ देते हैं। 'सर्जिकल स्ट्राइक' से उत्साहित होकर मित्र ने सवाल उछला -'ये सरकारें आतंकवादियों पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' की तर्ज पर अपने यहां गरीबी, भुखमरी के खिलाफ 'सर्जिकल स्ट्राइक' क्यों नहीं करती। घात लगाकर बेरोजगारी को क्यों नहीं निपटा देती।

मित्र के सर्जिकल हमले से भौंचक्के रह गए हम। जबाब नहीं सूझा फिर भी कह ही दिए -'ये 'सर्जिकल स्ट्राइक' सेना करती है। जबकि गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी से निपटने का काम सरकार का है। सरकार का काम सेना को कैसे सौंपा जा सकता है।

फिर सरकारें सेना के काम की वाहवाही बटोरने की बजाय अपना काम क्यों नहीं करती? गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी को क्यों नहीं निपटातीं? - मित्र बख्सने के मूड में नहीं थे।

मित्र के सवाल का कोई जबाब हम दे पायें तब तक पास बैठे मोबाइल में डूबे एक दूसरे मित्र ने जबाब उछाला-“ लोकतंत्र में सरकारों के लिये गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी बने रहना उतना ही जरूरी होता है जितना कि पाकिस्तान में सेना बने रहने के लिये आतंकवादी। इसीलिये वहां आतंकवादी की खेती होती रहती है यहां गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी को खाद पानी मिलता रहता है।“


हम कुछ और कहें तब तक दोनों मित्र टेलिविजन पर ’सर्जिकल स्ट्राइक’ पर ताजा खबरें सुनने लगे।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10209326872462276&set=a.1767071770056.97236.1037033614&type=3&theater

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Tuesday, October 11, 2016

व्यंग्य के बहाने-5



कल Arvind Tiwari जी ने लिखा :

"कविता और व्यंग्य में सर्जिकल स्ट्राइक का दौर शुरू। "

इस पर कई टिप्पणियां आईं। Nirmal Gupta जी ने लिखा :

"लेकिन जो हो रहा है वह यकीनन दुखद है। "

Subhash Chander जी ने अपना दु:ख इन शब्दों में बयान किया:

"व्यंग्य में बस बढ़िया लिखना ही कम हो रहा है ,बाकी सब तो खूब ही चल रहा है। "

अरविन्द तिवारी ने मुद्दे की तरफ़ इशारा करते हुये जबाब दिया :

"बिलकुल आज की तारीख़ में तो तलवारें निकल आयीं हैं ।अपना अपना आउट लुक है। "

इत्ता इशारा काफ़ी था अपन के लिये। मल्लब यह निकाला गया कि आउटलुक में कुछ छपा है जिसमें व्यंग्य का सर्जिकल स्ट्राइक हुआ है।


इसके बाद तो ज्यादा खोजना नहीं पड़ा। पता चला सर्जिकल स्ट्राइक Suresh Kant जी ने की है। उनका ही लेख आउटलुक में छपा है। पता चला कि उन्होंने आउटलुक में "दांत पर दतंगड" नाम से लेख लिखा है। उसमें उन्होंने एक भूतपूर्व लेखक के ऊपर व्यंग्य ’टाइप’ कुछ लिखा है। व्यंग्य में लेखक चुका हुआ बताया गया है, उसकी एक पत्रिका है, कुछ ’आंख के अंधे -गांठ के पूरे चेले हैं, भूतपूर्व लेखक अपने लिये और अपने चेलों के लिये इनाम इकराम हासिल करने की बात लिखी है। कुल मिलाकर एक बहुत साधारण सा लेख। लेकिन अब चूंकि किसी का नाम तो है नहीं इसलिये कोई कह नहीं सकता कि यह हमारे लिये है। कोई हल्ला मचायेगा या विरोध करेगा तो कहा जा सकता है कि भाई यह लेख तो प्रवृत्तियों पर है।

रमानाथ अवस्थी के गीत :

मेरी रचना के बहुत से हैं,
तुम से जो लग जाये लगा लेना।
लोग अपने जिसाब से कुछ गलत-सलत अन्दाज न लगा लें इसलिये सुरेश कांत जी ने पाठकों के भले के लिये अलग से टिप्पणी लिखकर बता दिया:

"मेरा यह व्यंग्य चुके हुए लेखकों द्वारा अपने को चर्चा में बनाए रखने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों पर है| ज्ञान ने इसे प्रेम जनमेजय से जोड़कर मेरी निंदा करने के बहाने प्रेम को 'चुका हुआ लेखक' बता दिया है|

ज्ञान भाई, दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर क्यों चला रहे हैं? क्या इसलिए कि अब तक यही करते आए हैं? "
बाकी की टिप्पणियां सुरेश कांत जी की कल की पोस्ट पर पढ सकते हैं।

कथा साहित्य में चरित्रों के बहाने लोगों पर लिखने की परम्परा थी। उदय प्रकाश जी की कई कहानियां किन-किन कवियों-लेखकों पर केंद्रित हैं इसके कई किस्से हैं।

व्यंग्य में परसाई जी ने भी लेखकों पर व्यंग्य करते हुये लिखा। लेकिन उन्होंने या तो साफ़ नाम लेकर लिखा ताकि गफ़लत न रहे किसी को या फ़िर प्रवृत्तियों पर लिखा तो ऐसे लिखा कि कोई उसे अपने से जोड़ न सके। ’दो लेखक’ लघु कथा में वे लिखते हैं:

"दो लेखक थे। आपस में खूब झगड़ते थे। एक दूसरे को उखाड़ने में लगे रहते। मैंने बहुत कोशिश की कि दोनों में मित्रता हो जाए पर व्यर्थ।

मैं तीन-चार महीने के लिए बाहर चला गया। लौटकर आया तो देखा कि दोनों में बड़े दाँत काटी रोटी हो गई है। साथ बैठते हैं साथ ही चाय पीते हैं। घंटों गपशप करते हैं। बड़ा प्रेम हो गया है।

एक आदमी से मैंने पूछा-'क्यों भाई, अब इनमें ऐसी गाढ़ी मित्रता कैसे हो गई इस प्रेम का क्या रहस्य है?'
उत्तर मिला-'ये दोनों मिलकर अब तीसरे लेखक को उखाड़ने में लगे हैं।"

लेखकों की प्रवृत्तियों पर लिखने की परम्परा लगता है परसाई जी के साथ ही विदा हो गयी। अब कोई व्यंग्य लेखक लिखता है किसी लेखक की प्रवृत्ति पर तो उसके सूत्र हालिया किसी घटना में पाये जा सकते हैं।


ऐसे ही जून के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में एक व्यंग्य गोष्ठी हुई। दिल्ली और आसपास के कुछ व्यंग्य लेखक उसमें शामिल हुये थे। उसके बाद 3 जुलाई को जनसत्ता में ज्ञान चतुर्वेदी जी की व्यंग्य लेख ’विचारक के किस्से’ के नाम से छपा। मुझे लगा कि ज्ञान जी ने वह लेख उस गोष्ठी में शामिल हुये लोगों की खिल्ली उडाते हुये लिखा है।

वह लेख जब सुशील सिद्धार्थ जी ने अपनी फ़ेसबुक वाल पर साझा किया तो मैंने उसकी कड़ी वाली आलोचना करी। सुशील जी ने उस समय ज्ञानजी की भक्ति भावना में डूबे थे इसलिये उनको अच्छा नहीं लगा कि इस तरह की आलोचना उनकी वाल पर हम करें। उन्होंने मेरी टिप्पणी मिटा दी। हमने फ़िर की। उन्होंने फ़िर मिटा दी। हमने फ़िर की उन्होंने फ़िर मिटा दी। इस तरह कई बार टिपियाने-मिटाने के बाद सुशील जी ने आजिज आकर मुझे फ़ेसबुक से अमित्र किया और फ़िर ब्लॉक किया। मतलब - "न मैं देखूं तोये को न तुझ देखन देऊं" ।
लेकिन अपनी टिप्पणी तब तक मैं वलेस ग्रुप में भी पोस्ट कर चुका था। जिसको Gyan जी ने भी पढ़ा और शायद अगले दिन ही जबाब भी लिखा। जबाब का लब्बो लुआब यह था कि उन्होंने जो लिखा उसका उस तथाकथित गोष्ठी से कोई लेना देना नहीं है जिसका जिक्र मैंने किया ( मतलब जो मैंने समझा वह मेरा बचकानापन था) उन्होंने यह भी लिखा उनके पास इन सब फ़ालतू की बातों के लिये समय नहीं है। प्रेम जी से और (शायद हरीश नवल जी से भी ) रोज बात होने का जिक्र भी किया था मैंने।

बाद में Harish Naval जी ने ज्ञान जी के लेख पर प्रतिक्रिया करते हुये लिखा:

" जनसत्ता में छपा ज्ञान भाई का लेख पढ़ते हुए जो अनुभूति हुई आपसे शेयर करना चाहता हूँ ....
ऐसा लगा कि अरे यह तो मेरे जागरण हेतु मुझ पर लिखा हुआ है ...असली लेखन लक्ष्य छोड़ कर या उसके होते भी क्यों मैं गोष्ठियों के मोह जाल में हूँ .....

जानता हूँ ऐसा भीतर से कुछ अन्य रचनाकारों को भी लगा होगा...मुझे तो ज्ञान भाई का सूक्ष्म ऑब्ज़र्वेशन हमेशा चमत्कृत करता है ,वे थोड़े में अत्यधिक आब्ज़र्व करने की क्षमता रखते हैं ...दिन भर व्यस्त रहने वाला डॉक्टर कैसे कितना भाँप लेता है यह उसकी प्रतिभा और बेधक सूक्ष्म दृष्टि का कमाल है .....

बहुत बहुत सही आकलन किया है भटके हुए बुद्धिजीवियों का......

भाव की विशिष्टता के साथ शैली का ओज ज्ञान भाई के व्यंग्यकार के पास भरपूर है .....सच कहूँ विगत ५० वर्ष से निरंतर हिंदी गद्य व्यंग्य के परिदृश्य से जुड़ा हूँ ,ज्ञान जैसा लेखन कौशल किसी के पास नहीं ....कई मायनो में ज्ञान ,परसाई जोशी आदि से आगे निकल चुके हैं ,ऐसा स्वीकार करने में मुझे सत्य का आभास होता है ....

प्रिय ज्ञान भाई तुम्हारे इस लेख से आँखें खुल रही हैं ....

....आभार दोस्त आभार ... "

यह किस्सा इसलिये कि सुरेश कांत जी का यह कहना समझ में नहीं आता और सही भी नहीं लगता कि ज्ञानजी ने सुरेश कांत जी का लेख पढकर उनकी भूरि-भूरि भर्त्सना की होगी। यह शायद किसी ने उनको ऐसे ही कह दिया मजे लेने के लिये। सुरेश जी ने लिख भी मारा इस पर। इसे अरविन्द तिवारी जी ने सर्जिकल स्ट्राइक कहा तो अपन भी उधर गये जहां यह हो रहा था। हरि जोशी जी भी भयंकर वाले खफ़ा हैं उन लोगों से जिन लोगों ने सब इनाम उनके पहले कब्जिया लिये। बाकी लोगों को मौका नहीं दिया।

यह मजेदार बात है! व्यंग्य में कुल जमा आठ-दस इनाम हैं। वे भी देर-सबेर सबको मिल ही जाने हैं अगर यहां लिखते-पढते रहे। लोगों ने इनको सम्मानित किया और कोई रहा नहीं होगा जिसको सम्मानित करते। तो इसमें सम्मानित लोगों का क्या दोष! :)

व्यंग्यकारों द्वारा प्रवृत्तियों के बहाने में लेखकों पर लिखने का चलन देखकर यह भी लगता है व्यंग्यकारों का अनुभव संसार अपने साथियों की गतिविधियां नोट करने उनकी विसंगतियां उजागर करने तक ही सीमित होता गया है। सुशील सिद्धार्थ जी के बहुचर्चित व्यंग्य संग्रह ’मालिश महापुराण’ (जिसकी 40 से अधिक समीक्षायें हुयीं जो कि शायद एक व्यंग्य संग्रह के लिये गिनीज बुक आफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में आ सकती है) के सत्रह लेख लेखकों पर केन्द्रित हैं। एक तरफ़ यह उनके लेखकों के गहन संपर्क में रहने का परिचायक है तो साथ ही उनकी सीमा भी बताता है कि उनका अनुभव संसार साथ के लेखकों तक ही सीमित है। लेकिन उसके बारे में अलग से विस्तार से। अभी उसकी समीक्षा लिखनी है मुझे।

इतना सब लिखने के बाद मैं भूल गया कि किस लिये लिखना शुरु किया था लिखना। कहना शायद यह चाहता है कि आज के समय में व्यंग्य लेखन में प्रवृत्तियों के बहाने जो व्यक्तियों पर लिखने का चलन है उसमें इतना अनगढपन है कि साफ़ समझ में आ जाता है कि यह किसके खिलाफ़ लिखा गया है। जो कहीं समझ में नहीं आता तो लेखक इशारा करके बता देता है कि किसके लिये लिखा गया है यह सब !

लेकिन यह तय है इस तरह का लेखन बहुत आगे तक नहीं जाता। कूड़ा-करकट की तरह समय की डस्टबिन में पड़ा रहता है। शायद खाद बनने लायक भी नहीं रहता।

क्या कहना है आपका ?


डिस्क्लेमर: व्यंग्य के बहाने का यह लेख किसी के प्रति दुर्भावना से नहीं लिखा गया। सभी के प्रति मन में आदर, उत्साह है मेरे मन में। जो लिखा निर्मल मन से लिखा। नाम लेकर इसलिये लिखा कि कोई गलतफ़हमी न रहे।

रही इनाम-विनाम वाली बात तो उसका अलग गणित होता है। इनाम हमेशा छंटे हुये लेखक को ही मिलता है। उसके बारे में इसकी पहली पोस्ट में लिख चुका हूं !

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209319133308802


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Monday, October 10, 2016

सड़क पर साईकल पथ

छुट्टी के दिन घर के पचास काम होते हैं। 49 टरका भी दो एक तो बच ही जाता है। निकलना ही पड़ता है घर से बाहर 'सर्जिकल स्ट्राइक' के लिए।

अब ये ससुर 'सर्जिकल स्ट्राइक' भी इतना पॉपुलर हो गया है कि आदमी निपटने भी जाता है तो कहकर जाता है -बैठ ज़रा अपना अभी 'सर्जिकल स्ट्राइक' करके आते हैं।

आर्मापुर से विजय नगर की तरफ जाते देखा कि सड़क के दोनों तरफ़ साईकल पथ बन रहा है। सड़क के किनारे दोनों तरफ की सड़क पर गड्ढा करके खंभे लगाये जा रहे हैं । खम्भे से फुटपाथ तक की सड़क साईकल के लिए सुरक्षित रहेगी।


कालपी रोड हाइवे है। साईकल बीच सड़क पर चलाने पर कोई भी ठोंक कर चला जा सकता है। उसके लिए सड़क का किनारा सुरक्षित करके रखना बढ़िया बात है।

जगह-जगह साईकल चलाने के लिए स्लोगन लगे हैं। 'साईकल चलायें, पर्यावरण बचाएं', 'मुस्कराइए कि आप साईकल पथ पर हैं' इसी तरह के और भी लुभावने वाक्य।



अभी तो पूरा रास्ता बना नहीं। लेकिन जिस तरह साईकल पथ पर ठेलिया वाले अपनी दुकान लगाकर खड़े हो गए उससे लगता नहीँ कि इस पथ पर साईकल चलेंगी। अंतत: इस जगह पर सब्जी वाले, फल वाले, मठ्ठा वाले ही खड़े मिलेंगे। साईकल बीच सड़क पर ही चलेगी। एक्सिडेंट बदस्तूर जारी रहेंगे।

आपका क्या कहना है इस बारे में?

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209310072922298?pnref=story

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