Sunday, December 25, 2016

कमलेश पांडेय और उनका आत्मालाप हमारी नजर में



......और ये निपट गयी ’आत्मालाप’ भी।
साल के शुरु में 16 जनवरी, 16 को दिल्ली के पुस्तक मेले से खरीदी थी किताब। लेखक कमलेश पाण्डेय संग थे तो उनसे ’प्रिय बंधु अनूप शुक्ल जी को बहुत आदर के साथ’ लिखकर दस्तखत भी किये थे किताब में। वह हमारी पहली मुलाकात थी कमलेश जी से। शुरु-शुरु में आदमी मिलता है तो औपचारिकता में आदर करता ही है। बाद में असलियत जानकर व्यवहार करता है।
हमने सोचा था और ऐसी आशा भी की गयी थी हमसे कि हम जल्दी ही इसके बारे में कुछ लिखेंगे। लेकिन हम अभी तक इसे पूरी बांच ही न पाये थे तो लिखते क्या?
यह हमारी किताबों को पढ़ पाने की घटती गति को बताता है। कभी वे भी दिन थे कि किराये की दुकान से रोज एक किताब (छुटके उपन्यास) लाकर अगले दिन बदल लाते थे। आज हाल यह हैं कि 143 पेज की ’आत्मालाप’ बांचने में महीनों लग जाते हैं। वह भी तब जब इसे पूरा पढ़ने का पूरा मन हो। कभी-कभी लगता है कि महीने भर की छुट्टी लेकर कम से कम मित्रों की लिखी किताबें तो बांच लूं।
किताब के साथ मजेदार वाकये भी हुये। रोज साथ दफ़्तर ले जाते थे। एक दिन निकालकर कम्प्यूटर वाली मेज में धर ली। सोचा लंच-ब्रेक में पढेंगे। लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि न पढ पाये उस दिन। फ़िर सामने न दिखी तो पढी न गयी। फ़िर अभी दो-तीन दिन पहले सोचा कि आज तो पूरी बांचकर ही सोयेंगे। लेकिन किताब मिली नहीं। हम सब जगह खोजे लेकिन नदारद। फ़िर याद आया कि दफ़्तर की कम्प्यूटर की मेज पर धरी थी। परसों देखे तो वहीं बेचारी नीचे उल्टे मुंह औंधे पड़ी थी। भौत गुस्सा आया खुद पर कि मुफ़्त में मिली हो तब तो कोई बात नहीं लेकिन खरीदी हुई किताब की इत्ती बेइज्जती तो ठीक बात नहीं न !
कल गाड़ी का बम्पर बनवाना था। किताब साथ में ले गये। गैरेज में पता चला कि पुराना बम्पर भी लाना होना होगा। हम घर आये। बम्पर ले गये। करीब घंटा भर लगा इस सबमें। फ़िर याद आया कि किताब तो गैरेज के शो रूम की मेज पर ही धरकर भूल गये। देखा तो किताब मेज पर जस की तस धरी थी। मतलब किसी ने उसको उलटकर देखा भी न था।
ये जो किताब पढने में हीला-हवाली का हम इत्मिनान से वर्णन कर रहे हैं न उसको अब सोचते हैं उपयोग भी कर लें। तो हम यह कहना चाहते हैं कि कमलेश पांडेय व्यंग्य लेखक कैसे हैं उस पर अपना मत बतायेंगे ही लेकिन उनकी किताब बांचकर यह कहने में कोई संकोच नहीं कि वे बहुत आलसी लेखक हैं। आलोक पुराणिक जैसे ’व्यंग्य के आधुनिक कारखाने’ कि संगत में रहते हुये भी उनके व्यंग्य लेखन की गति कुटीर उद्योग से भी कम है। वो तो भला हो कि ’व्यंग्य विधा’ का कोई सर्वमान्य अखाड़ा होता तो हम उनकी इस लेखन कंजूसी की शिकायत करके उनके खिलाफ़ हफ़्ते में कम से कम एक व्यंग्य लेख का फ़तवा तो जारी करवा ही लेते।
काबिलियत होते हुये भी अल्प लेखन से इस बात का सुराग मिलता है कि बंदे का जीवन (पारिवारिक और व्यक्तिगत) खुशहाल टाइप है और बंदा बेचैन तो कत्तई न है!
’आत्मालाप’ तीसरा व्यंग्य संग्रह है कमलेश जी का। भावना प्रकाशन से आया 2016 में। इसके पहले बाइसवीं सदी का विश्वविद्यालय(1999) और तुम कब आओगे अतिथि (2011) प्रकाशित हो चुके हैं। वे दोनों ही हमने बांचे नहीं हैं। अब जुगाड़ेंगे अगले साल में बांचने के लिये।
सुशील सिद्धार्थ और सुभाष चंदर की भूमिका और फ़्लैप टिप्पणी सहित ’आत्मालाप’ में कुल जमा 32 लेख हैं। अधिकतर लेख तसल्ली वाली मनस्थिति में लिखे हुये हैं। दो चार व्यंग्य लेख हालिया तरह अखबारी आपाधापी लेखन के आकार में हैं। शुरुआती लेख पढने पर मुझे लगा कि कमलेश पाण्डेय का व्यंग्य लेखन जुमले फ़ेंककर फ़ूट लेने वाली मुद्रा से मुक्त लेखन है। पहले हमने इसे धारणा भी बनाई कि अरे इनके लेखन में ’पंच’ तो अल्पसंख्यक हैं। जब मैंने यह सोचा उसी के आसपास मेरी मुंड़ी पर यह विचार हावी था कि व्यंग्य लेखन में पंच में कमी उसके कमजोर होने की निशानी है। लेकिन जब बाद के लेख पढे तो पंच भी मिले और खूब मिले।
कमलेश पांडेय का व्यंग्य लेखन कथा तत्व से भरपूर है। जबरियन पंच भर्ती करने के लिये उसमें कथात्मकता से छेड़छाड़ नहीं की गयी। भाषा के लिहाज से पढे-लिखे होने का सबूत देती हुई प्रांजल भाषा। शुद्ध । तत्सम ! ज्ञान जी की ’मरीचिका’ घराने की । विषय आसपास के रोजमर्रा के जीवन में होने वाली घटनाओं से लिये हुये। अंदाज-ए-बयां भले धीर-गंभार टाइप दिखे और लगे कि बन्दा अधुनिक जीवन की घपलेबाजी से परिचित न होगा लेकिन यह भ्रम धारण करने वाला जब उनके लेख बांचता है तो उसको इहलाम होता है जिस स्कूल में उसने पढाई की है उसके हेडमास्टर रह चुके हैं व्यंग्यकार महोदय।
लफ़्ज पत्रिका (और बाद में साहित्यम) के संपादक मंडल से जुड़े रहने के चलते हुये अनुभवों की बानगी उनकी लेखकों से जुड़े व्यंग्यों में मिलती है जिनमें उन्होंने पूरी इज्जत के साथ इस प्रवृत्ति की छीछालेदर की है।
’मुक्ति’ में उन्होंने आज के समय में किताबों की स्थिति पर खूबसूरत चर्चा की है।
’आत्महत्या’ जैसे विषय पर व्यंग्य लेखन हिम्मत का काम है। इसमें लिखते हैं कमलेश जी:
“आत्महत्या के प्रेरक तत्वों पर ध्यान दें तो हमारे देश की हर संस्था में वे भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं. इस प्रेरणा का ऊर्जा-केंद्र देश की समृद्ध राजनीतिक परंपरा में मौजूद है. जब भी आपकी श्रद्धा हो इस ज्योति-पुंज से प्रेरणा लेकर एक अदद सुसाईड नोट तैयार करें और आत्महत्या संपन्न कर लें. ध्यान रखें कि ये मात्र प्रयास न हो, क्योंकि अगर चूक हुई तो भारतीय दंड विधान में लपेटे जायेंगे जो आत्महत्या से ज़्यादा कठिन सिद्ध होगा.”
आत्महत्या के लिये प्रेरित करने वाले तत्वों को पहचानने के बाद वे आह्वान करते हैं-”अपनी हत्या स्वयं सम्पन्न करने की बजाय आपकी हत्या का षडयन्त्र कर रही शक्तियों के सुराग ढूंढें , उन्हें बेनकाब करें और बस में हो तो स्वयं की जगह उन्हें ही फ़ांसी पर लटकायें।“
शिक्षा व्यवस्था, मिड डे मील और इसी तरह की घाल मेल वाली योजनाओं की झांकी संस्कृतनिष्ठ भाषा में दिखाते हुये अपने लेख ’काग चेष्टा, बको ध्यानं, बैल प्रवृत्ति’ में लिखते हैं:
“कल ही आये नये आदेश में तो अति है। ग्राम में कितने तड़ाग हैं और कितनी पगडंडियां ? यों नियमित चल रही ढोर-डंगरों की की गणना में भी क्या तर्क संगत है। क्या पशुओं से जिज्ञासा करते फ़िरें कि तुम्हारे सींग कितने हैं, और दिन भर में कितना गोबर करते हो? कभी आर्थिक जनगणना और तो कभी बौद्धिक, कभी मूढमतियों की गणना तो कभी मति-भ्रष्टों की, समझ में नहीं आता कि सम्राट चाहते क्या हैं? और चाहते भी हैं तो हम शिक्षकों से ही क्यों चाहते हैं -निहिरानंद किसी मधुमक्खी की तरह भुनभुनाये।“
’डीडी त्रिशंकु पर’ पढते समय यह एहसास लगातार बना रहा कि यह परसाई जी की रचना ’इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ से प्रभावित होकर लिखी गयी लेकिन कुछ पंच बहुत धांसू हैं:
“कैडर प्रशासन की वह दीक्षा है जो एक सरकारी नौकर को आदमी का चोला उतारकर सच्चा प्रसाशनिक अधिकारी बनाती है।“
इससे अपनी नौकरशाही शामिल होते ही आदमी में होने वाले बदलाव की झांकी दिखाई गयी है। लेखक जब यह लिखता है तो बता देता है कि विकास के ताम-झाम की असलियत उसको पता है:
“विकास की खासियत ही है उसका होना किसी की नजर में न आये, जिसका होना बाकी है वो भी सर खुजाये और जिसका हो चुका वह भी। इस बीच विकास प्रोजेक्ट में लगे लोगों का विकास अपने आप हो जाये।“
”प्रोत्साहित होती हिन्दी’ में जब कमलेश पाण्डेय लिखते हैं, “इस युग में किताबें पढी जाकर नहीं बल्कि अपना मूल्य दूना-चौगुना पाकर सार्थक होती हैं।“ तो यह बात उनकी किताब के दाम के संबंध में लागू होती है जिसकी 143 पेज की कीमत 350 रुपये रखे हैं प्रकाशक ने। मतलब लेखक सच कहने में खुद को भी नहीं बख्शता है। बहुत निर्मम व्यंग्य लेखक है भाई !
’आत्ममुग्ध हम’ में कवितागीरी, गद्यगीरी करते हुये व्यंग्य के आंगन में फ़ांद पड़ने वाले लेखक सजीव वर्णन पढकर लगता है कि कमलेश पांडेय जितने शरीफ़ दिखते हैं खुराफ़ाती भी उससे कम नहीं हैं। व्यंग्य लेखन से जुड़े हुये जिस लेखक का नाम जेहन उभरता है उसको लिखकर कमलेश जी से पूछने का मन है कि क्या उनके ही बारे में लिखा है?
’आत्मालाप’ लेख जो कि इस व्यंग्य संग्रह का शीर्षक भी है में एकदम अलग तरह की भाषा प्रयोग की गयी है। प्रवाहयुक्त मने फ़र्राटेदार हिन्दी। मुझे लगता है कि यही भाषा कमलेश जी को आगे भी प्रयोग करनी चाहिये।
’मेरी राजनीतिक समझ’ में जब वे लिखते हैं:
“यहां बताता चलूं कि मैं बिहार से हूं जहां तन पर लंगोट ही भर हो तो भी उसमें राजनीति की पुडिया बांधे रहता है। बल्कि मुंह में हमेशा एक मुस्तैद जुबां भी रखता है जिसको धार देती हुई एक चुटकी राजनीति अगल-बगल ही खैनी की तरह दबी रहती है। आप पूछ भर तो कि मुद्दा क्या है?”
तब लगता है कि वे यह बात अपने व्यंग्य लेखन के बारे में भी अनजाने में लिख रहे हैं। व्यंग्य लेखन के हल्ला मचाऊ और इनाम झपटाऊ दौर में कमलेश पांडेय सब पहलवानों की गतिविधियों पर चुपचाप लेकिन सटीक नजर रखते हुये तसल्ली वाले ’मृदु मंद-मंद मंथर मंथर’ लेखन में अपने सहज आलस्य की मधुर तान के साथ जुटे रहते हैं।
जब मैंने आत्मालाप बांचना शुरु किया था तब तक मुझे लगता था कि ऐसे-वैसे टाइप के ही लेखक हैं कमलेश पांडेय जिनकी तीन किताबें आ चुकी हैं। लेकिन किताब को एक बार बांचकर खतम करने के बाद उनकी लेखकीय इमेज में गुणात्मक सुधार हुआ और हमको पता लगा कि कमलेश पाण्डेय बढिया इंसान ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन व्यंग्यकार भी हैं।
इस बढिया इंसान और बेहतरीन व्यंग्यकार के ’काम्बो पैकेज’ में एक खामी है तो यह कि वे नियमित लेखन से परहेज करते हैं। यह अच्छी बात नहीं है। ऐसा करके वे अपने साथ और व्यंग्य लेखन के साथ भी अन्याय करते हैं। आशा है कि वे अपने द्वारा किये जा रहे इस अल्प लेखन की शिकायत को दूर करेंगे और विपुल व्यंग्य लेखन करेंगे।
कमलेश जी को खूब सारी शुभकामनायें देते हुये कामना करता हूं कि ’आत्मालाप’ के अपने परिचय में उन्होंने पुरस्कार या सम्मान के आगे जो ’कोई नहीं’ लिखा है आने वाले समय में इस ’कोई नहीं’ की जगह कई इनामों का जिक्र हो। वे इसके सर्वथा काबिल पात्र हैं यह कहने में मुझे कत्तई संकोच नहीं।

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दिसंबर में देश

दिसम्बर के महीने में कम्बल में बैठे-बैठे देश के हाल बयान करना ऐसा ही है जैसा दिल्ली में खड़े-खड़े कन्याकुमारी के सूर्योदय की रनिंग कमेंट्री करना। लेकिन जब बयाना लिया है तो बयान तो करना ही पड़ेगा न!
दिसम्बर का महीना आ गया। साल बीतने को आया। सर्दी भी पड़ने लगी। जगह-जगह मूंगफ़ली के ठेले लग गये। कहीं-कहीं फ़ुटपाथ पर मूंगफ़ली के पिरामिड बने दिख रहे हैं। उन पिरामिडों के पीछे आलथी-पालथी मारे बैठा दुकानदार ग्राहक के इंतजार में पलक पांवड़े बिछाये बैठा है। बोहनी का इंतजार है उसको। अभी तक कैशमशीन नहीं लगवाई है अगले ने।
घरों में चाय की खपत बढ गयी है। बाहर से घर के अन्दर घुसता हुआ हर शख्स रजाई की तरफ़ लपकता हुआ ’जन्नत अगर है कहीं तो यहीं है, यहीं है, यहीं है’ का चलता फ़िरता इश्तहार लगता है।
कोहरे का जलवा बढ रहा है। पहाड़ पर तापमान शून्य के नीचे गुलाटियां खा रहा है। कानपुर में उतरने वाला हवाई जहाज लखनऊ में उतरता है। ऐसे जैसे कि अफ़गानिस्तान में अमेरिकी के ड्रोन भटककर निशाने से मीलों दूर गिरते थे । अंधेरे में दिखा नहीं होगा। भौत तेज स्पीड से उतरा होगा। कानपुर में रुकते-रुकते राजधानी पहुंच गया। “भैंस बियानी में गढ़ महुबे में पड़वा गिरा कनौजे जाय” की तरह ।
कोहरे के कारण ही शायद रिजर्व बैंक से निकले नोट भटककर एटीएम की जगह लोगों की तिजोरियों , तहखानों में पहुंच गये। दोष बेचारे बैंकरों और बिचौलियों को दिया जा रहा है।
ट्रेनें एक दिन बाद स्टेशन पहुंच रही हैं। पहिये को पटरी सूझती नहीं होगी। टटोल-टटोलकर आगे बढती होगी रेल पटरी पर। सड़कों पर गाड़ियां कोहरे के झांसे में आकर गले मिल रही हैं।
वैसे तो दिसम्बर हर साल आता है लेकिन इस बार कुछ अलग ही तरह आया है। नोटबंदी ने आम आदमी का ’नोटों से ब्रेकअप’ के कराकर बवालों से ’हुकअप’ करा दिया है। हर समस्या की गाड़ी नोटबंदी की पार्किंग में जाकर खड़ी हो जाती है। नोटबंदी की आफ़त के चलते ही सर्दी भी शायद अभी तक अपने साथ केवल कोहरे को साथ लेकर आई है। ठिठुरन, गलन, मरन, शीतलहरी आदि को छोड़ आई आई है। पता नहीं क्या बवाल हो जाये बिना नोटों के।
कोहरे की आड़ में नकली नोट असली नोटों के गले में हाथ डालकर रिजर्व बैंक में जमा हो गये हैं। काला धन और काला होकर नोटों के बीच मुंड़ी घुसाकर छिप गया है। नकली नोट असली नोटों के साथ इस कदर गड्ड-मड्ड हो गये हैं जैसे ईमानदारी के साथ काहिली और गैरजिम्मेदारी। दोनों को अलग करना मुश्किल हो गया है।
सांता बेचारे के बुरे हाल हैं सर्दी में। नोटबंदी के चलते लोगों को बांटने के लिये उपहार खरीदने में समस्या हो रही है उसको । उसके पास रखे सारे पुराने नोट कागज के टुकड़े में बदल गये। दुनिया भर के लोगों को दो हजार रुपये में कित्ते उपहार बांटेगा भाई कोई।
लेकिन सुबह होते ही सूरज भाई ने कोहरे का सर्जिकल करके उसको तिड़ी-बिड़ी कर दिया है। सूरज की किरणें चप्पे-चप्पे पर पसर गयीं हैं। मौसम किसी नोट भरे एटीएम सा सुहाना हो गया है। साल का आखिरी इतवार इस दुविधा में आधा बीत गया है कि पहले साल की यादों का हिसाब करें कि नये साल के संकल्प का चुनाव किया जाये। दोनों एक-दूसरे पहले आप, पहले आप कहते हुये समय को मूंगफ़ली की तरह टूंगते हुये बिता रहे हैं।
हम दिसम्बर में देश के हाल देखने के लिये सड़क पर आते हैं। एक आदमी बीच सड़क लम्बवत लेटा हुआ है। धूप-छांह की सीमा रेखा पर लेटा हुआ आदमी नशे में है। उसको उठाने की जो भी कोशिश करता है उसको वो गरियाने लगता है। दरबानों को गरियाते , मां-बहन की गालियां देते हुये हड़काता है- ’तमीज से बात करो, तुम पब्लिक सर्वेंट हो।’ गालियों में वजन लाने के लिये देश के प्रधानमंत्री को भी शामिल कर लेता है। दरबान हंसते हुये उसके नशे के उतरने का इंतजार करते हैं। कहते हैं -’इसका तो रोज का यही धंधा है।’
हर समस्या की एक सेल्फ़ लाइफ़ होती है। उसके बाद समस्या अपने-आप खत्म हो जाती है। नयी समस्या को जगह देने के लिये दुकान बढाकर चल देती। देश की हर बड़ी समस्या का इलाज इसी अचूक मंत्र से संभव है !
वहीं मैदान पर दूर तमाम पेड़ कोहरे की चादर ओढे खड़े हुये हैं। झाड़ियों-झंकाड़ के बीच बाकी बचे मैदान में पसरी हुई धूप में टेंट हाउस के रंग-बिरंगे शामियाने सूख रहे हैं। अनगिनत रंग बिखरे हैं कायनात में। इन जैसे ही रंगों को मिलाकर देश का रंग बन रहा है। अपन के इधर तो ’दिसम्बर में देश’ ऐसा ही बहुरंगी धज में दिख रहा है।
आपके उधर कैसा दिख रहा है 'दिसम्बर में देश'?

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Saturday, December 24, 2016

सड़क पर सांड़

ये फोटो विजयनगर का है। सड़क के दोनों तरफ फल की दुकानें हैं। 'अतिक्रमण हटाओ' के चलने पर फुटपाथ दिखने लगती है। दुकाने हट जाती हैं।
ये सांड भाई अपनी मुंडी प्लास्टिक की डलिया में घुसाये कुछ खा रहे हैं। शायद कुछ फल हों और उसके छिलके भी। क्या पता प्लास्टिक भी उदरस्थ कर रहें हो कुछ अनजाने में। मुफ़्त के माल में वायरस तो आएगा ही न।
सांड की फोटो खींचते हुए देखे वहीं पर एक ठेलिया पर फल बेचने वाला नोट गिन रहा था। नोटबंदी के समय खुलेआम , सरे-सड़क किसी का नोट गिनना अपने में दुर्लभ घटना है। लेकिन उसका फोटो हम लिए नहीं। क्या पता कोई छापा मारने पहुंच जाए कि इत्ते नोट आये कहां से।
वहीँ दो बच्चियां एक-दूसरे के कन्धे में हाथ धरे 'पक्की सहेली-मुद्रा' में सामने से आती दिखीं। हमने उनका फोटो लेना चाहा तो दोनों बड़ी तेज भागी। ऐसे जैसे जरीबचौकी क्रासिंग पर माँगने वाले बच्चे मोबाईल कैमरा देखकर तिड़ी-बिड़ी हो जाते हैं। भागकर दूर से वे हमको छिपकर देखती रहीं। गोया हम कोई 'खतरा टाइप' आइटम हों।
उनको ऐसे हमसे बचते देखकर ख्याल आया कि क्या पता कल कोई जनप्रतिनिधि किसी गाँव जाए और जनता उसको देखकर अपने गाँव से भागकर ऊसर-बीहड़ में छिप जाए कि कहीं नेता कुछ भला न कर जाए। कोई समाज सेवा न कर डाले। हो तो खैर इसका उल्टा भी सकता है कि जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की जनता को देखकर फूट ले कि कहीं जनता उसके कामों का हिसाब न माँगने लगे।
है कि नहीं ?

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Friday, December 23, 2016

बीच सड़क पर बीड़ी पीता आदमी




टाटमिल चौराहा
कल शाम दफ़्तर से लौटते हुये याद आया कि गाड़ी के ’प्रदूषण प्रमाणपत्र’ की आखिरी तारीख थी। मतलब अगर न बनवाया तो अगले दिन से ’जुर्माना ज़ोन’ में खड़े हो जायेंगे। मजे की बात कि याद आई ऐन उस जगह पर जहां ’प्रदूषण प्रमाणपत्र’ बनवाने की गुमटी थी।

हमने अपनी याददाश्त की पीठ ठोंकी। पिछले दिनों कई बार जरूरी चीजें भूलने के कारण डांट खा चुकी है ’याददाश्त’ । कल तारीफ़ पाने की खुशी ’याददाश्त’ के चेहरे पर साफ़ चमक रही थी। याददाश्त बेचारी लजाकर मुंडी में सिमट गयी। लाज-लाल ’याददाश्त’ की फ़ोटो अगर लगाते फ़ेसबुक पर तो खचिया भर टिप्पणियां, लाइक आते क्यूट, स्वीट, ऑसम घराने के।

प्रदूषण प्रमाणपत्र बनवाने के लिये बालक को पुराना वाला कागज दिया। बालक ने कागज देखकर कागज बना दिया। प्रदूषण का कागज कागज देखकर ही बनता है। गाड़ी थोड़ी देखी जाती है। गाड़ी इस बीच रानी बिटिया की तरह चुपचाप खड़ी रही- मुंह दिखाई के समय नई बहुरिया की तरह संकोच चेहरे पर धरे हुये। सत्तर रुपये में गाड़ी छह महाने के लिये प्रदूषण मुक्त हो गयी।

लौटने के लिये गाड़ी को सड़क पर लाने के लिये मोड़े। गाड़ी सड़क के लम्बवत ही हो पायी थी कि एक साइकिल सवार अचानक गाड़ी के आगे रुक गये। जब वे रुके तो हम भी रुक गये। साइकिल सवार बीच सड़क पर जेब टटोलकर कुछ निकालने लगे। हमें लगा कि कुछ जरूरी सामान याद आ गया होगा उसको खोजकर आश्वश्त होना चाहते हैं। यह भी लगा कि शायद मिल जाने पर वे भी अपनी याददाश्त की पीठ ठोंके। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वे जेब देर तक टटोलते ही रहे।



बम्पर विहीन वाहन 

जब अगले ने जेब टटोलना जारी रखा तो हमने हार्न बजाया। साइकिल थोड़ा आगे खिसकी लेकिन फ़िर भी वह सड़क के बीच में ही थी। फ़िर हार्न बजाया तो उन्होंने हैंडल पकड़े-पकड़े एक हाथ जेब में डाले हुये साइकिल थोड़ा और सरका ली। हमने फ़िर हार्न बजाया तो उन्होंने थोड़ा और सरका ली। मतलब आप समझ लेव कि जित्ती बार हमने हार्न बजाया उत्ती बार साइकिल सरका ली अगले ने। भाईसाहब हर हार्न पर अपनी ’पोजिशन-ए-साइकिल’ ऐसे बदल रहे थे जैसे रिजर्व बैंक नोटबंदी पर नित-नये नियम बदलती रहती है।


जब हमने गाड़ी घुमाकर सड़क पर सीधी कर ली तो देखा भाईसाहब फ़ाइनली सड़क के किनारे पहुंचकर जेब से लाइटर निकालकर बीड़ी सुलगा चुके थे। मतलब जो उनका अचानक रुकना था वह अचानक बीड़ी पीने की तलब उठने पर बीड़ी सुलगाने की इच्छा के चलते था। मैं उनके बीड़ी-प्रेम से बहुत प्रभावित हुआ।


सड़क पर अचानक रुककर बीड़ी पीने की इच्छा होने पर बीच सड़क पर खड़े होकर तसल्ली से बीड़ी सुलगाने की यह सामान्य सी लगने वाली यह घटना देखने में भले साधारण सी लगे लेकिन इसको हल्के में लेना ठीक नहीं होगा। इससे साफ़ पता लगता कि देश का आम आदमी तसल्ली से जी रहा है। अपनी मनमर्जी से बीच सड़क पर खड़ा होकर बीड़ी सुलगा रहा है। इसका मतलब देश के आम आदमी के परेशान होने का जो हल्ला किया जा रहा है वो सब झूठ है। देश का आम आदमी बीच सड़क पर अपनी साइकिल रोककर , सडक पर आती-जाती गाड़ियों से बेपरवाह, तसल्ली से बीड़ी पी रहा है। मजे में है आम आदमी।


यह लिखते हुये हमारे दिमाग के व्यंग्यकार वाले हिस्से ने सुझाया कि चलते-चलते अचानक बीच सड़क पर रुककर बीड़ी पीने की इस घटना को अचानक हुई ’नोटबंदी’ से जोड़ दो तो घटना का फ़लक बड़ा हो जायेगा। हमने सुझाव देने वाले व्यंग्यकार को बड़ी जोर से हड़काया - "तेरी तो ऐसी की तैसी। बड़ा आया फ़लक बड़ा करने वाला। लगता है टीवी देखते हुये तुम्हारे दिमाग में भी प्रतिक्रिया का स्तर जनप्रतिनिधियों जैसा दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है।"


हमारी हड़काई से दिमाग का व्यंग्यकार बेचारा घुटनों में मुंड़ी घुसाकर गुड़ी-मुड़ी होकर बैठ गया। बुदबुदाते हुये बोला-’हमारे कहने का मतलब गलत तरीके से समझा गया।’ हमें व्यंग्यकार की बेवकूफ़ी पर लाड़ सा आया। लेकिन हमने प्यार जाहिर नहीं किया। जाहिर करते तो वह फ़िर कोई और बेवकूफ़ी की बात करने लगता- मंच से भाषण करते नेता की तरह।


टाटमिल चौराहे पर रुकने का सिग्नल था। सिग्नल मतलब कोई ऐसा नहीं कि लाल बत्ती दिख रही हो। गाड़ियां रुकी थीं तो हम भी रुक गये। लेकिन हम चौराहे से कुछ कदम पीछे ही रुके रहे। पीछे रुकने की कारण यह था कि चौराहे पर गाड़ी खड़ी करते ही कोई आदमी आकर गाड़ी पोंछने लगता है। हमारे न न करते हुये भी वह गाड़ी का शीशा और खिड़की तो पोंछ ही डालता है। लगता है कि गाड़ी पर एकदम सर्जिकल कर रहा है। कभी-कभी आधी गाड़ी ही पोंछता है कि बत्ती हरी हो जाने के चलते हम गाड़ी स्टार्ट कर देते हैं। गाड़ी पोंछने के बावजूद अक्सर ही हम उसको कुछ पैसे नहीं देते (एकाध बार को छोड़कर)। यह न देना कई कारणों का गठबंधन है । इसमें उसका जबरियन सेवा देना, पैसे फ़ुटकर न होना, इसको ठीक न समझना जैसे बहाने शामिल हैं। लेकिन जब भी बिना पैसे देते हुये फ़ूटते हैं तो सेकेंड के बहुत छोटे हिस्से तक यह तो लगता है कि कित्ते चिरकुट हैं। किसी की मेहनत, भले ही वह जबरियन कर रहा हो, के पैसे मारकर फ़ूट लिये हैं।


लगता तो यह भी है कि देश के चौराहे में गाड़ी पोंछने के लिये लपकते हुये इन लोगों के लिये कोई काम नहीं उपलब्ध करा पाये हम लोग।


चौराहे की बात से ही याद आया कि एक दिन फ़जलगंज चौराहे के पास खरामा-खरामा जा रहे थे फ़ैक्ट्री। इतने में एक गाड़ी वाला बगल से आया। बायीं तरफ़ से उसने हमारी गाड़ी को ओवरटेक किया। इतनी तेजी में था वह कि हमारा अगला बंपर गाड़ी से उड़ा दिया। कैशलेश एकोनामी के दौर में हमारी गाड़ी ’बंपर लेस’ होकर बीच सड़क पर खड़ी हो गयी। हमने शांतभाव से आगे भागती गाड़ी की तेजी देखी। बंपरविहीन गाड़ी जीवनसाथी विहीन घर की तरह बेरौनक लग रही थी। बंपर हालांकि खुद राणा सांगा हो चुका था। लेकिन उसके चलते गाड़ी की इज्जत बची हुई थी। बंपर विदा होते ही रेडियेटर नंगा दिखने लगा। बेचारा शर्मा रहा था लेकिन अब क्या किया जाये। लग रहा था बीच सड़क रेडियेटर की चड्ढी उतार दी हो किसी ने। हमने उतरकर बंपर उठाया और वहीं चौराहे पर किनारे धर दिया।


शाम को लौटते देखा बंपर जहां रखा था उससे थोड़ा और दूर सुरक्षित रखा था। इस बीच हमने यह भी कल्पना कर ली थी कि कोई मेरा बंपर उठाकर ले गया होगा। उसमें लगी नंबर प्लेट को किसी गाड़ी में लगाकर कोई वारदात करेगा और नंबर से प्लेट के आधार पर पुलिस हमारी तलाश में घूमने लगेगी। यह ख्याल आने पर हमने अपनी अकल को इतना तेज डांटा था (प्लेट और बंपर साथ न लाने के लिये) कि बेचारी रुंआसी हो गयी थी। बंपर वहां देखकर अकल बेचारी ने संतोष की सांस ली। हमने उसको वात्सल्य की नजरों से देखना चाहा तो वह दिखी नहीं। कुछ देर बाद देखा कि अपना स्टेट्स ’फ़ीलिंग सैड’ से बदलकर ’फ़ीलिंग रिलैक्स्ड’ करने चली गयी थी।
बंपर को चौराहे पर पुलिस वाले भाई साहब ने ठीक से रख दिया था। कहा भी -’हमने किनारे रख दिया था कि जिसका होगा ले जायेगा।’ हमने उनको धन्यवाद दिया। बंपर को गाड़ी में धरा और घर आ गये। भागते भूत को लंगोटी कैसी लगती है मुझे पता नहीं लेकिन हमें टूटते बंपर के लिये गाड़ी की नंबर प्लेट ही भली लगी।


आज सुबह जब उठे तो कोहरा छाया हुआ था। कोहरे के चंगुल में सारी दिशायें ओस के आंसू रो रहीं थीं। अब सूरज भाई कोहरे के खिलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक कर रहे हैं। उजाला कोहरे पर ’रोशनी चार्ज’ करते हुये उसको तितर-बितर कर रहा है। सुबह हो रही है। सुहानी भी है। आपको मुबारक हो।
#रोजनामचा

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Wednesday, December 21, 2016

लम्हों ने खता की है सदियों ने सजा पाई

गंगा बैराज पर गंगा
बहुत दिन बाद सूरज भाई दिखे। चमक रहे थे आसमान पर। सड़क की दाईं तरफ थे। मन किया दक्षिणपंथी कहकर मजे लें। लेकिन अगले मोड़ के बाद वे हमारी बाई तरफ हो गए। हमें लगा हमारे मन की बात जानकर बदला पाला। मुस्करा रहे थे भाई। मानों कह रहे हों - 'चीजें एक जैसी होतीं हैं। दिखती कैसी हैं यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम उनको देख कैसे रहे हैं।'

सड़क पर दो कुत्ते विपक्षी पार्टियों की तरह एक-दूसरे पर भौंकते, उलझते, सुलझते मस्ती टाइप कर रहे थे। किसी आदमी को आते देख दोनों आपस में लड़ना छोड़कर उसपर मिलकर भौंकने लगते। आदमी पर भौंकते समय दोनों कुत्ते हो जाते । एक हो जाते जैसे धुर विरोधी विचार वाली पार्टियां चंदे के मामले में एक हो जाती हैं।
क्रासिंग पर दो टेंपो वाले किसी बात पर उलझ गए। तीसरा आकर एक का साथ देने लगा। अब एक टेम्पो वाले को दो से निपटना था। दोनों में से एक ने मारने के लिए हाथ उठाया। टेम्पो वाले ने उससे बचने के लिए हाथ बढ़ाया तब तक दूसरे ने उसको पीछे से थपड़िया दिया। पिटा हुआ टेम्पो वाला मुझे देश की जनता की तरह लगा जिसको सरकार ने काला धन पर रोकथाम के नाम पर नोटबंदी की चोट मार दी। लोग थोड़ी देर तक देखते रहे कि शायद कुछ और हो आगे लेकिन हम निकल लिए आगे।

बहुत दिन बाद गंगा नदी दिखी आज। सूरज की किरणें पानी में उतरकर बिंदास नहा रहीं थी। किरणें पानी में नहाते हुए खिलखिला रहीं थीं। ऊपर से सूरज भाई वात्सल्य से अपनी बच्चियों को मजे करते देख रहे थे। बाकी की किरणें कायनात को चमकाने में लगी हुई थी।


सूरज भाई हँसते हुए बोले - 'ठीक करते हो।बवाल से हमेशा 'हजार स्टेटस' की दूरी पर रहा करो। बहुत मन हुड़के कुछ लिखने का तो कोई ऐसे शेर ठेल दिया करो जिसको दोनों तरफ के लोगों को लगे कि तुम उनका समर्थन कर रहे हो। उनकी भी जय-जय। इनकी भी जय-जय। इसके बाद भारतमाता की जय। वन्देमातरम। इंकलाब जिंदाबाद कहकर फूट लिया करो।'
चाय की दुकान पर टैंया
सूरज भाई बतियाते हुए कहने लगे -'तुमने नहीँ लिखा कुछ करीना पुत्तर के नाम पर। पूरा सोशल मिडिया तो पटा पड़ा है तैमूर के नाम पर।' हम बोले -'हमको डर लगता है भाई जी। वर्ना लिखना तो हम यह चाहते थे कि तैमूर लंग के सदियों पहले का किस्सा तो हमने इतिहास में पढ़ा। उसका कत्लेआम सुना। उसके आधे नाम से जितना एतराज है उतना उस समय लाख लोग जो मारे गए वे करते तो इतिहास दूसरा होता। और नाम का ही देखा जाए तो नाथूराम ने गांधी जी को मारा। तो क्या किसी नाम में राम लगाने से आदमी खराब हो जाएगा। बच्चा जो अब्बी आया है दुनिया में उसको काहे सदियों पहले किसी के अपराध की सजा दी जाए।'

हम पूछे यहां कौन सा शेर फिट होगा भाई जी?

बोले बहुत हैं यार। गूगल किया करो। यही लिख मारो:

लम्हों ने खता की है
सदियों ने सजा पाई।

हमने कहा - 'न भाई अब इस मसले पर शेर-चीता बाजी न करेंगे।बवाल है ई सब। '

सड़क पर एक आदमी झाड़ू लगा रहा है। कूड़ा बीच सड़क से किनारे इकट्ठा कर रहा है। लगा कि कोई बैंकर बन्दनोट पर झाड़ू मार रहा है। एक बच्चा सड़क पर पानी की धार मार रहा है। मीलों दूर पसरी सड़क में कुछ मीटर पानी की घार ऐसे लग रही है मानो शहर के हजारों एटीएम में से किसी एक में नोट आ जाने से वो गुलजार दिखे।

ढाबे पर काम करता बच्चा चाय में बिस्कुट जल्दी-जल्दी डुबाकर खा रहा है। स्वेटर नहीँ पहने है। जाड़ा बचाने के लिए कमर हिलौवा डांस करता जा रहा है। साथ के लड़के से चुहल करते हुए मुस्कराता भी जा रहा है। शायद गाना भी गा रहा हो मन ही मन - 'बेबी को बेस पसंदा।'

ठिठुरता, डांस करता, मुस्कराता , चाय पीता और बतियाता बच्चा मल्टी टास्किंग का ब्रांड एम्बेसडर लग रहा था।

दस बारह साल के बच्चे को सुबह-सुबह ढाबे पर काम करते देख याद आया कि बालश्रम तो अपराध है। सरकार इसके खिलाफ है। अच्छा हुआ मैंने उससे कुछ लिया नहीं। अनजाने अपराध से बचे।

सड़क पर धूप पसरी हुई है। खिड़की से आती धूप बता रही है कि धूप गुनगुनी है। यह गुनगुनी धूप दुनिया में बहुतों को नसीब नहीं है। हमको मुफ़्त में मिल रही। इफरात में। हम इसके मजे लेते हुए सूरज भाई को धन्यवाद देने के लिए मुंडी उनकी तरफ करते हैं तो उनको मुस्कराते देखकर चुप रह जाते हैं। एक किरण भागते हुए आती है और हमारे चेहरे पर कबड्डी जैसी खेलते हुई मस्तियाने लगती है। उसके साथ उसकी अनगिनत सहेलियां भी हैं।

सब मजे से खेल रहीं हैं। धक्कम-मुक्का करते हुए पूरी कायनात को एलानिया बता रही हैं - उठो सोने वालों, सुबह हो गयी है- सुहानी वाली सुबह।


  

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Sunday, December 18, 2016

कैशलेश इकोनामी





अपना देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की गाड़ी में जनता सवारी होती है। ड्राइवर का काम सरकार करती है। सरकार चलाने के लिये नारों के ईंधन की जरूरत होती है। नारे लगते रहते हैं, सरकार सरपट चलती रहती है। नारे चुके, सरकार गयी।  


पुराने समय में नारे टिकाऊ होते थे। देर तक चलते थे। आराम-हराम है, जय-जवान, जय किसान , गरीबी-हटाओ जैसे नारे पांच-पांच साल खैंच लेते थे सरकार की गाड़ी। एक बार लगा दिया नारा फ़िर पांच साल कोई चिन्ता नहीं। लेकिन समय के साथ जनता के जीभ का स्वाद बदल गया है। जनता एक नारा लम्बे समय तक पसंद नहीं करती। सरकार को मजबूरी में नित-नये नारे गढने पड़ते हैं। न गढे तो आफ़त। उतार देगी जनता। दूसरा ड्राइवर रख लेगी।


पहले ’संयुक्त परिवार’ का जमाना था। एक कमाने वाला होता था दस खाने वाले। फ़िर भी काम चल जाता था आराम से। कमाने वाले की इज्जत होती थी। संयुक्त परिवार के टूटने के हरेक को कमाना जरूरी हो गया।  नारों के भी वही हाल थे। पहले एक नारा पांच साल आराम से खैंच लेता था। नारे इज्जत से लगाये जाते थे। आज के समय में नारों के बुरे हाल हैं। भौत बेइज्जती होती है। लगते ही खिल्ली उड़ाने लगते हैं लोग नारों की। नारों के हाल चुटकुलों सरीखे हो गये हैं। अक्सर तो याद तक नहीं रहते। नारे  एक दफ़िया पासवर्ड’ (OTP)  की तरह हो गये हैं। जैसे हर ट्रान्जैक्शन के लिये नया पासवर्ड चाहिये होता है वैसे ही अब हर दिन एक नया नारा चाहिये।

कैशलेश इकोनामीदेश का एकदम नया नारा है। अभी ट्रायल पर है। कोई कहता है इसके बाद देश धक्काड़े से आगे बढेगा प्रगति पथ पर। दीगर लोग कहते हैं देश के लिये  नया बवाल। लेकिन भैया ऐसे सोचो  तो जिन्दगी ही एक बवाल है। तो क्या जीना छोड़ दोगे। इसलिये शुभ-शुभ बोलो। 

आज के समय में देश में जो जिसमें होना चाहिये वह उसी से हीन हो रहा है। अखबार न्यूजलेशबुद्धिजीवी बुद्धिलेश , नायिकायें टॉपलेश, संसद बहसलेश , नौकरशाही कर्तव्यलेश और जननायक शर्मलेश हो गये हैं वैसे ही भैया आप भी कैशलेश हो जाओ। उसी में बरक्कत है।  जब सरकार ने नारा दिया है तो  लगाना तो पड़ेगा ही। इसलिये कैशलेश हो जाने में भी भलाई है। निभा लेव नारा। कुछ दिन बाद नया नारा आयेगा तब उसको चिल्लाना। 

कोई भी नारा सफ़ल होने के लिये उसके फ़ायदे गिनाना जरूरी होता है। तो आइये आपको गिनाते हैं कैशलेश इकोनामी के फ़ायदे।

 सबसे बड़ा फ़ायदा तो यह कि देश की बाकी सब समस्यायें  कैशलेश होते ही खत्म हो जायेंगे। कोई गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार की बात करे उससे कहा जा सकता है- भैया फ़ौरन कैशलेश हो जाओ, सब बवालों से मुक्ति पाओ।

 अभी 40 करोड़ (कोई कहता है 50 करोड़ कोई 60 करोड़। आप अपने करोड़ अपने हिसाब से तय कर लें) लोगों के बैंकों में खाते ही नहीं खुले। जिनके खाते ही नहीं खुले उनके खाते खुलवाकर उनको कैशलेश बनाने के काम में पूरा देश जुट जाये। जबरियन नसबंदीतर्ज पर जबरियन कैशलेशबनाया। जिसके पास पैसे बरामद हों उसके पैसे जब्तकरके उसको एटीएम थमा दिया जाये। प्रौढ शिक्षा केन्द्रकी तरह गांव-गांव कैशलेश शिक्षा केन्द्रखोले जायें। कैशलेश मित्रबनाये जायें। जो एक बार एटीएम से पैसा निकाल ले उसको कैशेलश साक्षरकी डिग्री दे दी जाये। नौकरी मेंकैशलेश साक्षरको वरीयता दी जाये।

कैशलेश साक्षरहो जाने के बाद अनपढ भी अपना बिना अक्षर पहचाने पासवर्ड प्रयोग करने लगेंगे। इस तरह भारत दुनिया का पहला हो जायेगा जहां अनपढ बिना अक्षर पहचाने उसका प्रयोग करना सीखें चुके होंगे। मास्टर लोग ककहरा सिखाने से पहले बच्चों को पासवर्ड बनाना सिखायेंगे।

एकबार कैशलेश की पटरी पर देश दौड़ने लगा फ़िर तमाम समस्यायें सर पर पैरधरकर फ़ूट लेंगी। छीना, झपटी के मामले कम हो जायेंगे। लोगों के पास जब पैसा  ही नहीं होगा तो लुटेगा क्या खाक? भीख मांगने वाले लोग  अपने बच्चों को मजबूरन स्कूल भेजेंगे। कहेंगे- जा बेटा कम से कम कुछ हैकिंग-सैकिंग सीख ले। कम से कम जिन्दा रहने का जुगाड़ रहेगा। हमारा जमाना गया जब कहीं भी खड़े हो जाते थे कटोरा लेकर तो कुछ मिल जाता था। लोग सिक्का फ़ेंककर निकल थे। आज किसके पास समय है जो हमारी मशीन में आकर कार्ड स्वाइप करके भीख दे। दो चार जो आते भी हैं तो इंटरनेट कनेक्शन ही नहीं मिलता। भीख मांगना अब वोट मांगने से भी गया बीता काम हो गया है। बहुत मेहनत पड़ती है। बिना हैकिंग सीखे अब  गुजारा नहीं।’

आने वाले समय में जगह-जगह हैकिंग सिखाने के स्कूल खुल जायेंगे। उनके विज्ञापन कुछ इस तरह होंगे- ’महीने भर में 1000 रुपये तक कैशलेश कमाई करना सीखें।’

गांवों में नये तरह के साहूकार पैदा होंगे। पहले जमाने के साहूकार लोगों के गहने गिरवी रखकर वुआज पर पैसे देते थे। नये जमाने में उनके कब्जे में लोगों के एटीएम होंगे। जिस साहूकार के कब्जे में जितने ज्यादा एटीएम होंगे वो उतना ही ताकतवर होगा। वे नये बाहुबली होंगे। जनप्रतिनिधि उनके पास ही वोट के लिये जायेंगे।  

गुंडे-बदमाशों की जगह देश में हैकरों की तूती बोलेगी। जिसके पास जितने कुशल हैकर होंगे उसकी मनपसंद सरकार होगी। सरकारें आज समर्थन के अभाव में गिरती हैं। कैशलेश इकोनामीहैक होना शुरु हो जायेंगी। 

कैशलेश होने का एक फ़ायदा यह भी होगा कि लोगों को करोड़ों, अरबों, खरबों के पैसे रखने के लिये जगह की जरूरत नहीं होगी। इससे जो जगह बचेगी उसमें लोगों के रहने की जगह निकल आयेगा। मुफ़्त आवास सुविधा के तहत लोग अपनी इमारतें  गरीबों को दे सकेंगे। 

कैशलेश व्यवस्था का मतलब धन का मूर्त से अमूर्त हो जाना। अभी धन हजार, पांच सौ, दस, पचास के नोट की शक्ल में दिखता है। कैशलेश हो जाने बाद दिखना बन्द हो जायेगा धन का। यह आस्तिकता से नास्तिकता की यात्रा होगी। बिना मार-पीट, खून-खराबे के एक नये तरह का ’आस्थान्तरण’  होगा।

 कैशलेश इकोनामी के आह्वान के बाद देश की सारी असमानतायें खतम हो जायेंगी। देश में केवल दो तरह के होंगे। एक वे जो कैशलेश हो चुके हैं। दूसरे वे जिनको कैशलेश होना है। किसी भी समस्या का हल उनके कैशलेश होने या न होने में ही पाया जायेगा। कोई व्यक्ति अपनी कोई भी समस्या लेकर आयेगा तो उससे कहा जा सकता है-’भैया तुम्हारी सब समस्याओं का हल कैशलेश हो जाने में है। कैशलेश हो जाओ, सब समस्याओं से निजात पाओ।’ अगर कोई कैशलेश हुआ व्यक्ति अपनी कोई परेशानी बताते पाया गया तो उससे कहा जायेगा- ’तुम तो कैशलेश हो गये। अब किस बात की परेशानी तुमको? झूठ बोलते हो तुम। कैशविहीन  हुआ आदमी अपने-आप  परेशानीविहीन माना जायेगा। जाओ भागो यहां से हमको बाकी लोगों को कैशलेश व्यवस्था से जोड़ना है।’ 

खैर यह सब छोड़ो। आप अपनी बताओ कि आप अभी तक ’कैशलेश इकोनामी’ से जुड़े कि नहीं? जल्दी से जुडिये वर्ना आप टापते रह जायेंगे और कोई नया नारा चलन में आ जायेगा।




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