Sunday, February 26, 2017

शराफ़त


#व्यंग्यकीजुगलबंदी-23  https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210666791279409
शराफ़त की तलाश में हम शरीफ़ को खोजते हैं। अगर कोई शरीफ़ है तो उसमें शराफ़त तो होगी ही न। अब शरीफ़ की पहचान कैसे करें? आजकल तो हर आदमी जो होता है दिखता उससे अलग है। लोग तो कहते हैं जो आदमी जैसा दिखता है वैसा कत्तई नहीं हो सकता। इसलिये देखकर शरीफ़ की पहचान करना मुश्किल काम है। फ़िर क्या करें? हरकतों से पहचाना जाये क्या?
हरकतों पर अगर जायें तो लोग कहते हैं - ’आजकल शरीफ़ आदमी की मरन है।’
लेकिन शराफ़त के इस नियम में लफ़ड़ा यह तय करने में है कि मरन किसकी हो रही है। मरन से मतलब यह हुआ कि मरा नहीं है लेकिन बस मरने ही वाला है। मरणासन्न है। इस लिहाज से तो देखा जाये तो सारी दुनिया शरीफ़ है। अपने यहां चुनाव जीतने के लिये मारकाट मचाती पार्टियां, उनके दिग्गज नेता, कश्मीर के लिये हल्ला मचाते नवाज शरीफ़ से लेकर प्रवासियों को खदेड़ने की कसम खाते ट्रंप तक, रूस की कुर्सी पर अंगद के पांव की तरह जमे हुये पुतिन से लेकर अपने मोहल्ले के नुक्कड़ पर पान फ़ेरते छज्जू पनवाड़ी तक सब शरीफ़ ही तो हैं क्योंकि सबको एक न एक दिन तो मरना ही है। सबकी मरन ही तो है।
लेकिन अगर इन सबको शरीफ़ मान लिया जायेगा तो शराफ़त का जी दहल उठेगा। वह आत्महत्या कर लेगी बेचारी।
एक और कहावत है शरीफ़ लोगों के बारे में। देखिये शायद उससे कुछ काम बने। कहा गया है:
लहूलुहान नजारों का जिक्र आया तो
शरीफ़ लोग उठे और दूर जाकर बैठ गये।
शराफ़त का यह टेस्ट बड़ा बवालिया है। इसके लिहाज से अगर टेस्ट करना हो तो पहले सौ-पचास लोगों को इकट्ठा करो। फ़िर भीड़ के सामने खून खराबा करो। लहू लुहान नजारों की रनिंग कमेंट्री टाइप करो। उसको सुनकर जो लोग दूर जाकर बैठ जायें उनको शरीफ़ मान लिया जाये। लेकिन इस टेस्ट में भी पेंच हैं। जैसे ही शराफ़त का यह इम्तहान शुरु होगा, लोग कहेंगे - “अबे फ़िर चुनाव आ गये क्या जो यह दंगा होने लगा?”
इसके अलावा भी उठने-बैठने से लाचार, गठिया के मरीज और लहूलुहान नजारों का जिक्र सुनने में असमर्थ (कर्ण दिव्यांग) लोग इस इम्तहान में फ़ेल हो जायेंगे। वे जहां के तहां बैठे रहेंगे। यह भी कि जिनके घर ’लहूलुहान नजारों वाले घटनास्थल ’के एकदम पास ही होंगे वे भी दूर जाकर बैठ नहीं पायेंगे। बहुत दूर से अगर लोगों को लाकर लहूलुहान नजारे दिखाये जायेंगे तो दिखाने वालों का खर्चा डबल हो जायेगा। उनको लाने के साथ दूर जाकर बैठने का भी खर्च देना पड़ेगा। शराफ़त का यह बहुत इम्तहान खर्चीला होगा। इसलिये यह टेस्ट अमल में लाने लायक नहीं है। शायरी तक ही ठीक है। वैसे भी हम लोग रोजमर्रा की जिन्दगी में देखते ही हैं कि लोग अपने आसपास खून-खच्चर होते देखते हुये अपने काम से काम रखते हुये जीते रहते हैं। कहीं दूर जाकर नहीं बैठते। लहूलुहान नजारों के बगल से जरा बचाकर निकल जाते हैं। इनमें से भी सब नहीं तो कुछ लोग तो शरीफ़ होंगे ही !
शराफ़त का मोटा-मोटी मतलब यह समझ में आता है कि जो अपने काम से काम रखे, किसी दूसरे के फ़ंटे में टांग न अड़ाये। ’न उधौ से लेना न माधौ’ का देना घराने का आदमी हो उसको शरीफ़ आदमी कहा जा सकता है।
इस लिहाज से भी देखा जाये तो और विकट कन्फ़्यूजन होता है। संपन्न और दबंग लोग गरीब और कमजोर को लूटने में अनासक्त भाव से लगे हैं। गरीब और कमजोर इसे अपनी नियति मानकर पूरी विनम्रता से लुटने में सहयोग कर रहा है। नेता जनता की भलाई के लिये उसके बुरे हाल बना रहे हैं। उनको पता है जितने बुरे हाल होंगे जनता के उतना ही उसकी सेवा और कल्याण में आसानी होगी। पूरी शराफ़त से वे जनता की सेवा का काम कब्जे में लेने में लगे हुये हैं। जनता की सेवा का ठेका पाने के लिये वे गाली, गलौज, मार-पीट, गुंडागर्दी वाली शराफ़त से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। लोकतंत्र में शराफ़त के नये-नये नमूने पेश कर रहे हैं।
बड़े पैमाने पर देखा जाये तो पाकिस्तान पूरी तन्मयता से खुद को बरबाद करते हुये भी पडोस में आतंक फ़ैला रहा है, अमेरिका विश्व में अमन कायम करने के लिये दुनिया भर में बम बरसा रहा है, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में दोस्ती बनाये रखने के लिये दोनों को हथियार बेंच रहा है। जिसके पास पैसा नहीं उसको अपने टेंट से दे रहा है (निकल तो आयेगा ही कभी न कभी)। विकसित देश अविकसित देशों को लूट रहे हैं और इसके बाद उसी लूटी हुई सम्पत्ति के कुछ हिस्से से उनकी आर्थिक सहायता कर रहे हैं। दुनिया भर में लोकतंत्र का हल्ला मचाने वाले अरब में राजतंत्र की हिफ़ाजत में लगे हुये। पूरी शराफ़त से अपना काम कर रहे हैं।
लेकिन शराफ़त का सच्चा नमूना देखना है तो बाजार के पास आना चाहिये। बाजार लोगों को लूटता भी है और लूटने के बाद लूट से बचने के तरीके भी बताता है। आपकी ही जेब से पैसा निकलकर आपको दर्द भी देता है। इसके बाद आपके पैसे से ही वह आपके दर्द की दवा भी बेंचता है। वह अपराध में भी सहयोग करता है, अपराधी को पकड़वाने में सहयोग भी करता है। बाजार अगर इंसान होता तो उसको दुनिया का सबसे शरीफ़ इंसान कहा जाता।
चलन के हिसाब से देखा जाये तो किसी आदमी की शराफ़त तभी तक शराफ़त कहलाती है जब तक वह दूसरे की शराफ़त में अडंगा न लगाये। अड़ंगा लगाते ही अगले की शराफ़त या तो बेवकूफ़ी में बदल जाती है या फ़िर (औकात के हिसाब से) हठधर्मिता, बदतमीजी, जबरदस्ती , मनमानी आदि-इत्यादि गुणों में बदल जाती है। विडम्बना यह है कि बेवकूफ़ी वाली बात को लोग तो मुंह पर कह देते हैं लेकिन बाकी को शराफ़त ही कहते रहते हैं।
मतलब कमजोर की शराफ़त को बेवकूफ़ी और समर्थ हठधर्मी की बदतमीजी और मनमानी भी शराफ़त ही कहलाती है।
इत्ते घनचक्कर हैं इस शराफ़त की राह में कि आपको और घुमायेंगे तो आप हमसे कहने लगोगे - ’अजीब बेवकूफ़ी कर रहे हो यार शराफ़त के नाम पर।’
हम आपकी बात काट भी नहीं पायेंगे क्योंकि एक तो आपकी बात कहीं से गलत भी नहीं होगी और अगर होगी भी तो भी आपकी हर बात को शराफ़त कहना हमारी मजबूरी है फ़िलहाल। :)
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Friday, February 24, 2017

स्मार्ट शहर में जाम


कल सुबह दफ़्तर जाते हुये सूरज भाई फ़ुल मूड में दिखे। सुबह-सुबह का समय था इसलिये गरम तो नहीं लेकिन चमक खूब रहे थे। सारी सड़क पर किरणों और उजाले का इंतजाम था। पेड़-पत्ती-फ़ूल सब जगह किरणें खिलखिला रही थीं। एकाध पत्तियां हवा के इशारे पर खुद तक धूप न पहुंचने की शिकायत करने के लिये जैसे ही हिलीं, उजाले और किरणों ने उनका मुंह चमका दिया। जन्मदिन केक कटने पर जैसे क्रीम से मुंह पोत देते हैं उसी तरह पूरी पत्ती, कली को रोशनी से लहलहा दिया। पत्ती मगन मन और तेज थिरकने लगी।
चौराहे पर स्कूल बस बिना गोल चक्कर लगाये शार्टकट मारते हुये निकलने लगी। आजकल भीड़ के चलते सवारियां चौराहे पर चक्कर लगाने का समय बचाते हुये ऐसे ही निकल जाती हैं। ट्रैफ़िक वाले भी अक्सर यह काम कराते हैं। जाम हटवाते हैं, जाम लगवाते हैं।
बस के आगे बैटरी वाले ऑटो ने अपनी गाड़ी सटा गयी। दस गुनी बड़ी बस अपना सा मुंह लेकर खड़ी हो गयी। ड्राइवर पिपियाते हुये आटो के निकलने का इंतजार करता रहा। ऑटो वाला अपने आगे वाले रिक्शे वाले को हटने के लिये हार्न बजाता रहा। जब तक बुजुर्ग रिक्शा वाला पहले उचककर और फ़िर उतरकर रिक्शा आगे से हटा दिया तब तक ऑटो वाले ने उसको दो-चार हल्की टाइप गाली दे डालीं। सुबह का समय होने के चलते गालियों में गुस्सा और तेजी की कमी थी। लेकिन गालियां तो गालियां थीं जैसी भी हों। रिक्शे वाला आगे निकलजाने के चलते उसे सुन नहीं पाया तो आसपास के राहगीरों को सुननी पड़ी।
फ़जलगंज चौराहे के पर एक दूसरे के लम्बबत जाते दो मोटरसाइकिल सवार के अगले और पिछले पहिये हल्के से भिड़ गये। जब तक दोनों को भिड़ने का पता चलता तब तक वे लोग न्यूटन बाबा के जड़त्व के नियम का सम्मान करते हुये एक दूसरे से दस मीटर की दूरी पर पहुंच गये थे। एक ने मुड़कर दूसरे को देखा। गर्दन में शायद तकलीफ़ थी इसलिये पूरी तरह नहीं देख पाया। दूसरा सवार हेलमेट पहने थे। उसने भी हेलमेट उतारकर कुछ करने बोलने की मंशा जताई लेकिन दूसरी तरफ़ से कोई पहल न होते देख चुप रहा। अंतत: दोनों किकिया के अपने-अपने रास्ते चले गये। लगता है दोनों को दफ़्तर पहुंचने की जल्दी रही होगी।
हमसे आगे एक रिक्शे वाला रिक्शे पर लम्बी सरिया लागे हुये चला जा रहा था। सरिया रिक्शे से तीन-चार फ़ुट पीछे तक तोप की तरह निकली हुई थी। खतरे का निशान बताने की गरज से उस पर एक लाल कपड़ा लहरा रहा था। हमको लगा रिक्शा चलने पर हिलती सरिया गाना गा रही है- हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा मलमल का।
झकरकटी पुल पर भीड़ के चलते हुये धीमे हुये स्कूटर पर एक पुलिस वाला. हल्का हाथ देकर, बिना कुछ पूछे अधिकार सहित बैठ गया। जैसे विक्रम के कन्धे पर बेताल बिना कुछ पूछे बैठ जाता है उसी तरह। स्कूटर वाले ने कुछ पूछने की बेवकूफ़ी भी नहीं की। आगे टाटमिल चौराहे पर बेताल विक्रम से बिना कोई सवाल पूछे उतर गया।
हमको लगा कि जब आप किसी से कोई सुविधा लेते हो तो सवाल पूछने का सहज हक अपने आप खो देते हैं।
लौटते में फ़िर झकरकटी पुल पर जाम मिला। एक ऑटो वाले ने हमसे कहा - ’ए सैंट्रो , आगे बढो भाई।’ हमने अचकचा कर आगे देखा। हमारे आगे की सवारी और हमारी गाड़ी के बीच आधा मीटर की सड़क खाली थी। हमने फ़ुर्ती से आगे बढकर उस सड़क पर कब्जा किया। फ़िर थम गये। इस बीच एक बैटरी वाले ऑटो वाले ने बगल वाले ऑटो वाले से कुछ कह दिया। बगल वाले ने जाम का व्यवहारिक उपयोग करते हुये अपना ऑटो चलता हुआ छोड़ा और ऑटो वाले के पास अकड़ता हुआ आकर उसको सबक सिखाने की बात करने लगा। दूसरा ऑटो वाला भी जबाबी सबक सिखाने की बात की बात करने लगा। दोनों के बीच सड़क पर ही गालियों का जबाबी कीर्तन होने लगा। बात कुछ आगे बढती तब तक जाम कुछ आगे सरक गया। एक मीटर जगह सड़क पर निकल आई थी। आगे वाले ऑटो वाले ने सबक सिखाना स्थगित करके अपना लपककर अपना ऑटो संभाला और आगे बढ गया।
एक बार फ़िर सिद्ध हुआ कि सड़क पर लगने के बाद खुला हुआ जाम कई झगड़े स्थगित कराता है।
जरीब चौकी पर एक बड़ी कार वाला हमको बायें से ओवरटेक करते हुये आगे निकला। तब तक क्रासिंग बन्द हो गयी। कार में किसी को निकलते देखकर मुझे लगा कि अब यह पीछे आकर हमको किसी बात पर हड़कायेगा। हालांकि मैंने गलती जैसी कुछ की नहीं थी। लेकिन उसकी गाड़ी बड़ी थी और हमारे आगे होने के चलते उसको मुझे बायें से ओवरटेक करना पड़ा यह भी कम बड़ा अपराध नहीं था मेरा। हमें यह भी लगा कि वह निकलेगा तो साथ में कोई कट्टा टाइप लहराते हुये या तो फ़ौरन गोली चलायेगा या फ़िर कुछ देर बाद चलायेगा।
मन किया कोई कानून बनना चाहिये जिससे किसी गाड़ी को देखते ही पता चल जाये कि अंदर बैठे लोग कितने गुस्से में हैं। उनके पास कट्टा है कि नहीं। लेकिन कानून बनने से होता क्या है भाई आजकल। कानून बेचारे का तो जन्म ही उल्लंघित होने के लिये होता है। अपने लोगतंत्र में हर कानून बेचारा अपना उल्लंघन करवाकर ही जिन्दा रह पाता है। जहां उसने उल्लंघन होने से एतराज किया, बदल दिया जाता है।
फ़्रिर हमको लगा कि जैसे थरमल इमेजिंग से लोग अंधेरे में भी दिख जाते हैं वैसे ही कोई गुस्सा इमेजिंग तकनीक भी होनी चाहिये। किसी के दस/सौ मीटर दूर से ही पता चल जाये कि उसका कितना गुस्सा है। वह देखते ही कच्चा चबायेगा या फ़िर हल्ला-गुल्ला मचाकर शान्त हो जायेगा।
विजय नगर चौराहे पर तो गदर जाम लगा था। मतलब हर दिन की तरह नजारा था। हमारे पीछे वाले ऑटो वाले अपने पीछे वाले ऑटो की तरफ़ देखते हुये हमारी आगे वाली गाड़ी वाले को गाड़ी को गाली थी। गाली देना का कारण शायद यह रहा हो कि वह जाम में सबसे आगे खड़ा था। चौराहे पर हर तरफ़ से गाड़ियां आ रही थी। सब जाम में फ़ंस जा रही थीं। हर गाड़ी वाला अपने हिसाब से आगे निकलने के लिये छटपटा रहा था, फ़टफ़टा रहा था। फ़िर फ़ंस जा रहा था।
अचानक पीछे वाला ऑटो वाला आगे निकलकर जाम हटवाने में सहायता टाइप करने लगा। गाड़ियों को दिशा बताते हुये निकालने लगा। गाड़ियां अदबदाकर इतनी तेज आगे बढ़ीं कि एकबारगी लगा कि उसके ऊपर चढकर निकल जायेंगी।
कल को हो सकता है कि बड़ी गाड़ियां अपने विज्ञापन में बतायें- ’ अब जाम के झंझट से मुक्ति पाने के लिये जिन्दगी भर के एक/दो जामब्वॉय साथ में।’ सेटपनी की तरह शायद डिक्की में बैठे रहे वे जामब्वॉय। जहां जाम लगा फ़ौरन उतरकर हटवाने लगें।
कानपुर स्मार्ट शहरों की लिस्ट में सुमार हो रहा है शायद। इसकी यह स्मार्टनेस ही है कि यहां के चौराहे किसी ट्रैफ़िक सिग्नल के मोहताज नहीं। किसी चौराहे पर कहीं हरी बत्ती जलती दिखी तो जाम ट्रैफ़िक को आगे बढने से रोक देता। ट्रैफ़िक के हाल अनारकली सरीखे हो जाते हैं। हरी बत्ती उसे रोकती नहीं, जाम उसे आगे नहीं जाने देता।
आगे वाली छुटकी गाड़ी आगे बढने में देर कर रही थी क्योंकि उसके आगे एक ट्रक लम्बवत खड़ा था। पीछे वाली गाड़ी घुरघुराते हुये ऐसे आवाज कर रही थी मानो आगे वाली पर दांत पीस रही हो।
इस बीच अचानक जाम खुल गया। सारी गाड़ियां कांजी हाउस की दीवार टूटने पर भागते जानवरों की तरह भागी। भागते हुये हमने जाम हटाने के सूत्रधार ट्रैफ़िक वाले सिपाही को देखा। सैकड़ों गाड़ियों के बीच फ़ंसा सिपाही हर तरह से गाड़ियों को निकालने की कोशिश कर रहा था लेकिन सब गाड़ी वाले अपनी मनमर्जी कर रहे थे। जाम लगाने में सहयोग कर रहे थे।
हमने घर पहुंचकर जो सांस ली उसे सांसों की भाषा में सुकून की सांस कहते हैं।
#रोजनामचा#व्यंग्य है क्या यह ?

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व्यंग्य की जुगलबंदी -22

व्यंग्य की जुगलबंदी -22 का विषय था -बोल सारा रा रा। होली से इतना मिलता-जुलता होने के चलते साथियों ने खूब होलियाया। सबसे पहले Yamini Chaturvedi आईं अपना हिसाब लेकर और शुरुआत की :
जोगिरा सा रा रा रा
होली रंग त्यौहार है, रिमझिम बरसै फाग
रंग भंग की मस्ती मैं बाढ़े जोगीरा तान
जोगीरा सा रा रा रा
आगे समसामयिक घटनाओं से जोड़कर लिखते हुये नोटबंदी पर लिखा:
नोट बंद कर लाइन में जनता दई लगाय
कालाधन तो ना मिलो, कैशलेस हुई जाय
जोगीरा सा रा रा रा
फ़िनिशिंग टच देते हुये सोशल मीडिया की कहानी उजागर कर दी:
गोरी सोवे सेज पै, मुख पे डारे केस
केसन पाछे कर रई व्हाट्सएप पे चैट
जोगीरा सा रा रा रा
ये तो हमने बस नमूने बताये। पूरे सारा रा रा देखने के लिये आप उनकी पोस्ट पर पहुंचिये। लिंक यह रहा :
Udan Tashtari ने खुद भले सातवीं में पढ़ते हुये कभी होली पर निबंध न लिखा हो लेकिन दूसरे बच्चे की कापी में होली का निबंध देख लिया। बच्चे से लिखवाया:
“होली के दिन स्कूल की छुट्टी होती है. इस दिन हम मम्मी, पापा और उनके खूब सारे दोस्तों के साथ मिल कर पिकनिक पर जाते है. सब एक दूसरे से गले मिलते हैं और हैप्पी होली बोलते हैं. बच्चे दिन भर खूब खेलते हैं. पापा मम्मी और उनके दोस्त बीयर पीते है. केटरर खूब सारा खाना बनता है. डी जे वाला गाना बजाता है. सब लोग नाचते हैं. देर शाम को सब थक कर घर वापस आ कर सो जाते हैं... “
संस्कारधानी वाले इसको देखेंगे तो दौड़ा लेंगे कि यहां बीयर कौन पीता है होली में। इसके बाद समीरलाल व्यंग्यात्मक मोड़ में आ गये और कहने लगे:
बाथरुम में झाँक के बोले अपनी ये सरकार
रेनकोट में नल के नीचे, बैठे हैं सरदार
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा
अमेरिका को भी लेकर आ गये समीर बाबू होली के बहाने और बोले:
सच को झूठ बताने वाले, जीत रहे हैं जंग
सीएनएन को रोज झिड़कते, राष्ट्रपति जी ट्रम्प..
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा
पूरा लेख बांचने के लिये उड़नतश्तरी का इधर आइये
Sanjay Jha Mastan ने शुरुआत हर-हर गंगे से किया और लिखा:
मैश - अप के हमाम में बोलो हर हर गंगे
मिडिया के रिवेंज पोर्न में सब के पंगे नंगे
जोगीरा सा रा रा रा रा रा रा
सारा रा रा के बहाने सरकार का भी अबार्शन करा दिया:
बूथ दर बूथ पानी हुआ और दूध का दूध
प्रेग्नेंट थी सरकार अब है अबॉर्शन का मूड
जोगीरा सा रा रा रा रा रा रा
फ़ाइनली मन की बात करने लगे संजय झा मस्तान :
दो पाटन के बीच में कोई बाकी बचा न जात
रेडियो में कौन कर रहा है अपने मन की बात
जोगीरा सा रा रा रा रा रा रा
पूरी पोस्ट इधर देखिये संजय की : https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=10155067451062658&id=640082657
Anshu Mali Rastogi होली के इतने मूड में थे कि इनबॉक्स में ही धमक गये। कारण बताते हुये बोले भी:
“लाइफ में आदमी दो स्टेजस पर ही ‘बौराता’ है। पहला- शादी का प्रस्ताव स्वीकारते वक्त और दूसरा- फागुन के महीने में। शादी की बौराहट जब तलक तलाक की नौबत न आए तब तलक यों ही बनी रहती है। किंतु फागुन की बौराहट महीने भर में खुद ही ‘ठंडी’ पड़ जाती है। “
इनबॉक्स में होली का कारण भी बताया:
“हालांकि होली के रंगों से मुझे एलर्जी तो नहीं मगर रंगने-पुतने से जरा बचता ही हूं। एंवई, अच्छा-खासा टाइम खोटी हो लेता है रंगों को छुटाने में। इसीलिए फेसबुक के ‘इन-बॉक्स’ में होली खेलना अधिक पसंद करता हूं। यहां न रंग लगाने-लगवाने का झंझट, न छुटाने का संघर्ष। एकदम सिंपल डिजिटल तरीके से होली का लुत्फ। “
आखिर तक पहुंचते हुये अपनी मंशा भी साफ़ कर दी:
“होली पर महिला मित्र से इन-बॉक्सिए रंग खेलने में बुराई तो कोई नहीं बस जोगी रा सा रा रा रा रा... बहुत अधिक नहीं होनी चाहिए। अपनी मंशा तो बस इत्ती रहती है कि अबीर-गुलाल इन-बॉक्स में थोड़ी-बहुत हंसी-ठिठोली के साथ उड़ते रहें। न हम ओवर होएं। न महिला मित्र ओवर होए। हां, तबीयत में रंगीनियत बनी रहे। और क्या चाहिए। “
अंशुमाली रस्तोगी का लेख पढ़ने के लिये इधर आइये: https://www.facebook.com/anshurstg/posts/200438177103211
Alok Puranik होली में गालव गजक खाते हुये लेख लिखते हुये बताया:
“स्वाद और सुंदरियों की साधना तो इधर के कुछ नये ऋषिवर कर रहे हैं। पहले तो ऋषि की जिंदगी खासी स्वादहीन ही होती होगी। ऋषिगिरी पर्याप्त नोटप्रदायक कैरियर तो इधर ही हुई है। एक बहुत ही प्रख्यात और सम्मानित प्राचीन ऋषि के नाम पर स्थापित संस्था कब्जनाशक और वीर्य को पुष्ट करने वाली दवाओं की बिक्री करती है।”
पूर्वजों के पल्ले सेल्समैन शिप का काम आ गया है। खुलासा करते हुये बताया :
“पुरानों के नाम पर जाने क्या क्या हो रहा है। गजक से लेकर जूते तक बिक रहे हैं।”
पूर्वजों का भविष्य देखते हुये आलोक जी लिखते हैं:
“ शाहजहां साहब क्या पता पाँच दस हजार सालों बाद कारोबारी के तौर पर चिह्नित किये जायें, जिनके चाय ब्रांड और जूता ब्रांड थे। गालवजी की नाम परमानेंटली गजक के साथ जोड़ दिया जाये।”
हमने तो बस झलकियां दिखाईं लेख की। पूरी पोस्ट बांचने के लिये आप इधर पहुंचिये:
https://www.facebook.com/puranika/posts/10154475061578667
Nirmal Gupta जी ने होली में अप्रैल फ़ूल मना लिया। होली के बहाने शोले फ़िल्म की याद करते हुये लिखा:
“अब सवाल किसी जवाब की प्रत्याशा में पूछे भी नहीं जाते ,अब प्रश्न उठाये जाते हैं।ठीक उसी तरह उठाये जाते हैं जैसे हेल्थ कांशस लोग जिम में जाकर बहुरंगी वजन उठाते हैं।जैसे सिक्स या एट एब्स वाले नायक फूल –सी नायिका को बड़े सलीके से उठाया करते थे / हैं।”
हाल में हो रहे चुनाव की असलियत की तरफ़ इशारा करते हुये कहा:
“अलबत्ता राजनीतिक बयानों के जरिये फाग तो शुरू हो लिया है।हर दल इतनी इतनी सीटों पर काबिज होने वाला है कि एक एक राज्य में अनेकानेक सरकारों का गठन होगा ।इतने अधिक मुख्यमंत्री बनेगे कि पदानुकूल कुर्सियों का टोटा पड़ने वाला है।इस बार सारे राजनीतिक दल जीतने वाले हैं।लेकिन जनता को नहीं पता कि उसकी करारी हार कितने मार्जिन से होगी।उसे जोगी सा रे रे का न तो ठीक से पता है और न उसे पता लगाने की कोई आतुरता है।उसे तो यह पता है कि इस बार होली से पहले फर्स्ट अप्रेल फूल को आ जाना है। “
आखिर में निर्मल जी लिखते हैं:
“यह रंगपाशी का नहीं वक्त के अनुरूप रंग बदलते रहने का अवसर है।यह रंगदारी का गिरगिटिया समय है।यह रंगदारों के लिए मनोनुकूल मौका है।वाटर प्रूफ दस्ताने पहन कर बहते दरिया में हाथ धोने में ही बचाव है।एक दूसरे के गले रेतने की इस मारक होड़ में खुल्लमखुल्ला कुछ न करने में ही भलाई है। “
यह लेख बाद में हरिभूमि में छपा भी। पूरा लेख पढने के लिये इधर आयें।
रविरतलामी जी का फ़ेसबुक खाता फ़ेसबुक पेज में बदल गया अत: टैग करने में लफ़ड़ा होता है। उन्होंने हालिया बयानबाजी को अपने लेख में शामिल करते हुये सारा रारा तुकबंदी की। देखिये नमूना:
शौचालय में लगे ताले को दिखाते हुये लिखा:
शौचालय तीन ताले में
जनता निपटे मैदान में
बोलो सा रा रा रा रा रा
हालिया गधा गीरी वाले बयानों पर लिखते हैं:
गुजराती गधे चले दिल्ली
और सैफई के नखलऊ में
बोलो सा रा रा रा रा रा
लेख का पूरा मजा फ़ोटो सहित लेने के लिये इधर आइये
अनूप शुक्ल ने लिखने में देरी की। जब लिखा तो जोगी रा सारा रा रा की उत्पत्ति खोजने लगे:
“लगता है कभी, किसी ने किसी जोगी को शरारा पहने देख लिया होगा कभी। जटा-जूट धारी ,’स्त्री संग-संसर्ग पलायन कारी जोगी को कम कपड़ों में देख अटपटा लगा होगा उसको। औचक उसके मुंह से निकल गया होगा -जोगी रा सा रा रा। “
जोगीरा सारा रा रा में साम्प्रदायिक सद्भाव देखने की कसरत भी की:
“बताने वाले बताते हैं कि जोगी रा सारा रा रा में साम्प्रदायिक सद्भाव की छटा दर्शनीय है। जोगी का संबंध हिन्दू और हिन्दी है शरारा का जुड़ाव मुस्लिम मने उर्दू से है। दोनों को मिलाकर जो बना जोगी रा सारा रा रा उससे हिन्दुस्तानी मेलजोल की संस्कृति का झण्डा फ़हराने लगा।”
अंतत: राजनीति के मैदान में पहुंच ही गये अनूप शुक्ल भी और लिखते भये:
“नेता जी भाषण दे रहे हैं। बिजली, पानी, लैपटाप, साड़ी ब्लाउज, मकान, रोजगार देने का वादा करते हैं। जनता सुन रही है। जनता जानती है नेता जी मजाक के मूड में हैं। वह बोलती है जोगी रा सारा रारा। नेता जी को सुनाई पड़ता है- ’जिन्दाबाद , नेता जी जिन्दाबाद।’ वे अविभूत हो जाते हैं। फ़िर नये वादे करते हैं। चुनाव में वोट देने के लिये कहते हैं। जनता कहती है -जोगी रा सारा रा रा। “
लेख पूरा बांचने के लिये इधर पहुंचिये। https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210638998024595
बाकी साथी शायद व्यस्तता के चलते लिख नहीं पाये। शायद आगे लिखें। लिखेंगे तो इसमें शामिल करेंगे उनको भी।
फ़िलहाल इतना ही । व्यंग्य की जुगलबंदी कैसी लगी बताइयेगा। 

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Thursday, February 23, 2017

जोगी रा सारा रा रा


सबसे पहले ’जोगी रा सा रा रा’ कब, किसने, किसको,किसलिये, किस तरह बोला होगा यह पता करना पड़ेगा। कस के बोला होगा या बोल के कस लिया होगा यह भी पता नहीं। किस करके बोला या बोल के किस किया इसका वायरल वीडियो भी नहीं दिखा कहीं। पता करना पड़ेगा।
लगता है कभी, किसी ने किसी जोगी को शरारा पहने देख लिया होगा कभी। जटा-जूट धारी ,’स्त्री संग-संसर्ग पलायन कारी जोगी को कम कपड़ों में देख अटपटा लगा होगा उसको। औचक उसके मुंह से निकल गया होगा -जोगी रा सा रा रा।
यह भी हो सकता है कि जैसे राजनीतिक पार्टियों की निगाह विरोधी दल की हर हरकत पर रहती है उसी तरह जोगी जी के दिमाग में शरारा चलता रहता हो। माया से बचने के लिये माया का ध्यान करते रहते हों जोगी मतलब शरारा चिन्तन। जिस तरह जोगी लोग दस-बारह-पंद्रह बच्चे पैदा करने का आह्वान करते रहते हैं उससे भी लगता है इस बारे में कितनी चिन्ता करते हैं वे।
यह भी हो सकता है कि कोई जोगी कहीं शरारत करते पकड़ा गया हो। जैसे अपने पतंजलि पुरुष अक्सर करते दिखते हैं। बस लोगों ने हल्ला मचा दिया होगा -जोगी रा सारा रा रा। होने को हो तो यह भी सकता है कि किसी गांव में कोई गम्भीर टाइप जोगी जी रहते होंगे। गांव वाले उनकी गम्भीरता से आतंकित होकर उनसे गुहार लगाते हों -जोगी रा सारा रा रा। मतलब जोगी जी शरारत करिये।
बताने वाले बताते हैं कि जोगी रा सारा रा रा में साम्प्रदायिक सद्भाव की छटा दर्शनीय है। जोगी का संबंध हिन्दू और हिन्दी है शरारा का जुड़ाव मुस्लिम मने उर्दू से है। दोनों को मिलाकर जो बना जोगी रा सारा रा रा उससे हिन्दुस्तानी मेलजोल की संस्कृति का झण्डा फ़हराने लगा।
जो हो मेरी समझ में जोगी रा सारा रा रा का मतलब विसंगति से है। गम्भीर रहने वाले जोगी से हंसी मजाक करना भी एक विसंगति ही है।
हमारे मोहल्ले में एक बुजुर्गवार रहते हैं। झाडनुमा दाढी , ऊटपटांग बतकही और निठल्ला घूमते रहने के बावजूद वे दीगर बाबाओं जितने प्रसिद्ध नहीं हुये तो सिर्फ़ इसलिये कि मोहल्ले की गलियां टेलीविजन की ओबी वैन आने लायक चौड़ी नहीं थी और बुजुर्गवार इस बात के सख्त खिलाफ़ थे कि अपनी गली छोड़कर कहीं बाहर जायें।
बुजुर्ग हो जाने के चलते मोहल्ले भर के लोग उनको बाबा जी कहते कोई जोगी जी। जब टेलीविजन पर किसी बाबा को महिलाओं को दस बच्चे की पैदा करने की सलाह देते सुनते तो देश की शिक्षा व्यवस्था पर सर धुनते कहते इन जाहिलों को दस के आगे की गिनती भी नहीं आती है। दस बच्चे पैदा करने के बाद खाली बैठकर क्या करेगी महिलायें।
आज ही मिल गये जोगी जी। किसी बच्चे की भूगोल की किताब मिल गयी तो नक्शे का एक हिस्सा नोचकर बोले -पाकिस्तान को इस तरह उड़ा देना चाहिये दुनिया से। नक्शे से पाकिस्तान को उड़ाने के बाद किताब हमारी तरफ़ फ़ेंक दी। हमने देखा - नक्शे से पूरा कनाडा और चवन्नी भर अमेरिका नुचा हुआ था।
हिन्दुस्तान को सलामत देखकर हमने सुकून मनाया। लेकिन डर भी लगा कि कब तक बचेगा हिन्दुस्तान इनके गुस्से से।
हमने जोगी जी का गुस्सा टालने के लिये टेलीविजन पर न्यूज चालू कर दी। नेता जी भाषण दे रहे हैं। बिजली, पानी, लैपटाप, साड़ी ब्लाउज, मकान, रोजगार देने का वादा करते हैं। जनता सुन रही है। जनता जानती है नेता जी मजाक के मूड में हैं। वह बोलती है जोगी रा सारा रारा। नेता जी को सुनाई पड़ता है- ’जिन्दाबाद , नेता जी जिन्दाबाद।’ वे अविभूत हो जाते हैं। फ़िर नये वादे करते हैं। चुनाव में वोट देने के लिये कहते हैं। जनता कहती है -जोगी रा सारा रा रा।

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Monday, February 20, 2017

'व्यंग्य श्री सम्मान-2017' रपट-9


[इसके पहले की रपट बांचने के लिये इधर आयें https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210609110437424]
[अगर आप व्यंग्यकार हैं तो आप में सच बोलने की कुटेव तो होगी। आप ठकुर सुहाती नहीं कर सकते। आप चेहरा देखकर बातें नहीं कर सकते।- ज्ञान चतुर्वेदी]
ज्ञान जी का वक्तव्य आयोजन की उल्लेखनीय उपलब्धि रही। अच्छा यह हुआ कि संतोष त्रिवेदी ने इसको रिकार्ड कर लिया। इससे बाद में सुनकर उसका आनन्द उठा सके। संतोष और मैं वहां कार्यक्रम में अगल-बगल ही बैठे हुये थे। ज्ञानजी के वक्तव्य के बीच-बीच में प्राम्पटिंग टाइप भी करते जा रहे थे। वो भी टेप में आ गई हैं। एक बार तो प्राम्पटिंग इतनी धीमी आवाज में की वो मंच पर बोलते हुये ज्ञानजी के कान तक पहुंच गयी और ज्ञान जी ने उसको भी अपने वक्तव्य में प्रयोग करके यह बताया कि अपने आसपास घट रही घटनाओं का उपयोग लेखन में कैसे किया जा सकता है।
[ज्ञानजी का पूरा वक्तव्य यहां पढिये https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210583105987329 ]
ज्ञान जी का वक्तव्य अपने में एक मुकम्मल व्यंग्य लेख सा ही था। हास्य से शुरु होकर करूणा तक पहुंचते हुये बाजार के हल्ले पर खतम हुआ। मजे लेते हुये उन्होंने शुरु में ही बता दिया कि आलोक पुराणिक को व्यंग्य श्री सम्मान दिलाने के प्रस्तावक और एक निर्णायक वे भी थे। पता नहीं सम्मान की गोपनीयता के कुछ नियम भी होते हैं कि नहीं लेकिन जो बात सभी को पता है वह खुले मंच से बताकर बाकी के निर्णायकों का फ़ोन का खर्चा बढा दिया। अब वे सबको फ़ोन करके सबको बता रहा हैं कि निर्णायक तो हम भी थे लेकिन हमने किसी को नहीं बताया।
बात में इनाम प्रक्रिया का और खुलासा करते हुये ज्ञान जी ने जानकारी दी - "मेरी नजर में पैर छूने के बहुत सारे और क्राइटेरिया हैं। जिनमें आप जिसका सम्मान करते हैं वह भी और जुगाड़ में पैर तो छुये ही जाते हैं।" यह खुलासा होते लोग पूछने लगे -’ ज्ञान जी दिल्ली में कब तक हैं। भोपाल की गाड़ी में रिजर्वेशन पता करो यार।’
ज्ञानजी ने अपने एक निर्णायक होने की बात कहकर अपने लिये और दूसरे निर्णायकों के लिये भी समस्या का जुगाड़ कर लिया। पता चला कि जिस किसी को इनाम नहीं मिला वो फ़ौरन ज्ञान जी को फ़ोन करके पूछेगा -’ भाईसाहब, आप हमें बस ये बता दीजिये कि किसने-किसने विरोध किया था? बाकी हम निपट लेंगे बस आप अपना आशीर्वाद बनाये रखियेगा।’
वैसे ज्ञानजी ने तमाम इनामों की कमेटी में रहे होंगे। और भी उनके साथ के लोग रहते हैं। वैसे भी लेखक जब बड़ा हो जाता है और उसका लिखना पढ़ना कम हो जाता है उसे इनाम तय करने का काम थमा दिया जाता है। बड़े लोग अपनी-अपनी पसन्द के लोगों को इनाम देने की संस्तुति देते हैं। कभी-कभी इनाम मिल जाता है और कभी नहीं भी मिलता है। इस चक्कर में कभी-कभी इनाम के प्रस्तावक/निर्णायक की भद्द भी पिट जाती है। ज्ञानजी हाल ही में इस तरह के हादसे का शिकार भी हुये हैं। किसी को इनाम दिलाने की कोशिश में किसी दूसरे के लिये भी इनाम की हामी भर लिये। लेकिन हुआ अंतत: यह कि जिसको चाहते थे उसको मिला नहीं और जिसको नहीं चाहते थे उसको मिल गया। डबल अफ़सोस का शिकार हुये।
इस बारे में हरीश नवल जी ज्यादा अनुभवी इनाम के प्रस्तावक और निर्णायक हैं। पिछली बार दिल्ली में उन्होंने बताया - ’इनाम तो जो देने वाला होता है वही तय करता है। प्रस्तावक और निर्णायक तो बहाना होता है।’
बहरहाल ज्ञान जी ने आलोक पुराणिक की भरपूर तारीफ़ की। उनको नयी भाषा गढ़ने वाला, नये प्रयोग करने वाला, व्यंग्य के सौंदर्य की समझ रखने वाला बताया। यह भी कि आलोक उन चंद लोगों में हैं जिनको पढकर उनका दिल जुड़ा जाता है ( जी जुड़ा जाना कहते तो अनुप्रास की छटा भी दिखती )। कुल मिलाकर ज्ञान जी ने आलोक पुराणिक की इतनी तारीफ़ की उनका गला सूख गया।
जब ज्ञान जी ने तारीफ़ करते हुये गला सूखने की बात कही तो मुझे उनके ’तारीफ़ कंजूस’ होने का एक कारण यह भी समझ में आया कि लोग उनके लिये पोडियम पर पानी का इंतजाम नहीं रखते।
आलोक पुराणिक अपनी तारीफ़ में फ़ूलकर अपने साल भर पहले के आयतन में पहुंचने ही वाले थे कि ज्ञान जी ने उनको बड़े लेखक बनने का रास्ते का झलक दिखा दी। न सिर्फ़ दिखा थी बल्कि सजा टाइप सुना दी कि अब तुमको बड़ा लेखक बनना ही है (गनीमत रही कि यह नहीं कहा कि अगर बड़े लेखक बनने के रास्ते पर नहीं बढे आगे तो इनाम के पैसे ब्याज सहित वापस धरा लिये जायेंगे)।
ज्ञान जी ने बड़े लेखक बनने का रास्ता जो बताया उसमें तेज हवाओं, ऊंची चढाई, अकेलेपन, तम्बू का ऐसा हौलनाक सिलसिला दिखा कि मानों सियाचिन का वीडियो चल रहा हो। कमजोर दिल का लेखक होता तो कलम-फ़लम फ़ेंककर कहने लगता - ’हमको नईं बनना बड़ा लेखक। हमसे इतना चढना-उतरना न हो पायेगा।’
यह भी लगा कि बड़ा लेखक बनने का आसान तरीका पर्वतारोहण की ट्रेनिग कर लेना होगा। शायद इसीलिये बड़े लेखक को जो करना होता है वह जवानी में कर लेता है। बढती उमर के चलते बाद में पर्वतारोहण मुश्किल लगता है।
ज्ञानजी ने हिन्दी व्यंग्य की स्थिति पर चिन्तित होने का काम भी किया लेकिन इस बार अलग तरीके से किया। इस बात यह कहकर चिंतित हुये कि अब हिन्दी व्यंग्य पर चिन्ता नहीं करूंगा। अनूप शुक्ल की बात का उल्लेख करते हुये कहा - "मेरे मित्र शुक्ल जी यहां बैठे हैं उन्होंने कहा था कि आप बयानों की कदमताल क्यों करते हो। तो यह बयानों की कदमताल भी मान पर यह महत्वपूर्ण है। कई बातें बार-बार कहनी पड़ती हैं। कुछ चिन्तायें जैसे बेटे के बारे में है, घर के बारे में है, आपकी चिन्तायें बार-बार आती हैं। उनको आप कहें कि चिन्ताओं को बार-बार रिपीट करके कुछ कदमताल कर रहे हैं तो यह गलत है।"
ज्ञान जी के वक्तव्य में ’एक ही जगह पर कदमताल’, लिखने की मुमुक्षा’, नये लेखकों में छपास, सोशल मीडिया में लाइक/टिप्पणी से संतुष्ट हो जाने’ जैसे वाक्यांश नहीं आते तो लगता है कि ज्ञान जी नहीं कोई और बोल रहा है। हमको अपने वहां रहने का थोड़ा अफ़सोस हुआ और उससे ज्यादा अपनी उस टिप्पणी का अफ़सोस जिसको ध्यान में आते ही ज्ञान जी सहज होकर कायदे से हिन्दी व्यंग्य पर चिन्तित न हो सके।
इस बारे में मुझे परसाई जी का माखनलाल चतुर्वेदी जी पर लिखा संस्मरण याद आया।
"मैंने ‘वसुधा’ में उनके कुछ शब्दों व मुहावरों के ‘रिफ़्लेक्स’ की तरह आ जाने पर टिप्पणी लिखने की गुस्ताखी की। लिखा था कि अगर माखनलाल चतुर्वेदी का गद्य है तो दो पैराग्राफ़ में पीढ़ियां, ईमान, बलिपंथी, मनुहार, तरूणाई, लुनाई आ जाना चाहिए, वरना वह चतुर्वेदी जी का लिखा हुआ नहीं है। मुझे उनके भांजे श्रीकांत जोशी ने बाद में लिखा कि दादा ने बुरा नहीं माना। मुझसे कहा कि यह परसाई ठीक कहता है। तुम इक कार्डबोर्ड पर इन्हें लिखकर यहां टांग दो, ताकि मैं इस पुन: पुन: की आव्रत्ति से बच सकूं।"
बाद में एक और संस्मरण में मैंने पढा थ कि माखनलाल चतुर्वेदी जी का वसुधा में लेख छपने के लिये आया तो उसमें पीढ़ियां, ईमान, बलिपंथी, मनुहार, तरूणाई, लुनाई नहीं थे। परसाई जी ने इस शब्दों को लेख में शामिल कर लिया। माखनलाल जी ने पूछा तो परसाई जी ने कहा -’अगर वे शब्द शामिल न होते लेख में तो लगता है किसी और ने लिखा है लेख।’
कहने का मतलब यह कि अगर ज्ञानजी के वक्तव्य में हिन्दी व्यंग्य पर चिंता नहीं होगी तो यह मानना थोड़ा मुश्किल होगा कि वक्तव्य उनका ही है। वैसे भी ज्ञानजी जब आज के व्यंग्य लेखन (खासकर नये लेखकों की) की बात करते हैं तो वे संयुंक्त परिवार के उस पिता की तरह लगते हैं जो अपने बच्चों को प्यार तो बहुत करता है लेकिन सार्वजनिक इजहार करने के चलन के मुताबिक बच्चों को नालायक ही बताता है। उस कड़क मास्टर की तरह है यह अन्दाज जो अपने जहीन शिष्यों को दस में चार नंबर देता है पर बाद में अकेले में बताता है तुम्हारे छह नंबर हमने सफ़ाई के काट लिये बाकी जबाब तुमने उम्दा दिया था।
हरेक का प्यार करने का अंदाज अलग-अलग होता है। 
ज्ञान जी जब अपने लेखन की बात करते हुये कहते हैं " ज्ञान चतुर्वेदी के लिये बहुत सारे लोग सुपारी ले सकते हैं " तो मुझे लगता है यह जबरियन गढा गया ’हाइप’ है। ज्ञानजी अब अपने ’हम न मरब’ की कुछ आलोचनाओं से दुखी होकर कहते हैं - ’इस आलोचना से मुझे लगा कि मेरी पीठ पर किसी ने छुरा भोंक दिया ।’ तो मुझे अच्छा नहीं लगा। ऐसा लगा कि उन्होंने खुद अपनी एकांगी आलोचना को सही मान लिया। आज कम से कम व्यंग्य लेखन में उनके आसपास कोई नहीं है। उनके उपन्यासों के जो मानवीय पहलू हैं, जो करूणा है (खासकर स्त्री पात्रों में) वह कहीं भी अन्यत्र दिखती नहीं। ’हम न मरब’ में जब अम्मा के बारे में लिखते हैं ज्ञान जी:
" रोबे की कोई बात नहीं बिन्नू। हमाई बात को समझो।हम एकदम सही बात कह रहे हैं।हमें इस पौर से बाहर निकालो। तब तो हम मर पायेंगे। इतें ही पड़े रहे तब तो हम कभी न मर पायेंगे।’ अम्मा ने कहा।
सावित्रा सिसकती रहीं।
’इतें से निकालो।.. अभी के अभी निकालो हमें। बिन्नू..., हमें इसे से निकालो।’ अम्मा उत्तेजित हो चलीं।
सावित्री क्या जबाब दें?
’बिन्नू, तुम हमें बब्बा वाले कमरा में धरवा दो।.. अब हम बब्बा के कमरे में ही रहेंगे।...अब तो बब्बा का कमरा खाली हो गया न? .... हमें वोई कमरा दिला दो।...उते भौत उजाला है। घर के ऐन सामने पड़ता है।....जमदूत घर में घुसेंगे तो हम उन्हें एकदम सामने ही दिख जायेंगे।...तुम तो हमें बब्बा वाला कमरा दिला दो बिन्नू, नहीं तो हम कभी भी न मर पायेंगे।...’ अम्मा की उत्तेजना बढ रही थी।
सावित्री फ़ूट-फ़ूटकर रोने लगीं।
’इत्ते अंधेरे में छुपा के न धरो हमें।....तुम्हारे हाथ जोड़ते हैं बिन्नू।...’ अम्मा बोलीं। उनकी श्वास तेज-तेज चल रही है। बेचैन होकर वे खटिया के हाथ-पांव पटकने लगीं।"
मानवीय करुणा का यह दुर्लभ आख्यान है।
लिखते-लिखते मन भारी हो गया। बीच में आंसू भी आये थे। हमने उनको वापस फ़ुटा दिया कहते हुये कि बाद में आना।
कहना हम यही चाहते हैं कि ज्ञानजी हम पूरी मोहब्बत से आपके लिखे को पढते हैं। उतनी ही उत्सुकता से आपके उपन्यास का इंतजार कर रहे हैं। अब आप सारे चकल्लस छोड़ छाड़कर इसई काम में जुट जाइये। बकिया सारा बवाल हम झेल लेंगे बस आप अपने को देवता बनाने वालों से बचने का इंतजाम खुद देख लीजिये। वो आप देख लेंगे इसका हमें पक्का भरोसा है। 
अब बहुत हुआ। चयास लग आई। इसलिये बात यहीं खतम करते हैं पूरी मोहब्बत, आदर और सम्मान के भावों की निरन्तर कदमताल करते हुये। 
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Sunday, February 19, 2017

'व्यंग्य श्री सम्मान-2017' रपट-8


पिछली पोस्ट बांचने के लिये इधर आयें https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210608763948762
आलोक पुराणिक के बाद समारोह के मुख्य अतिथि , शीर्ष व्यंग्यकार Gyan Chaturvediजी ने आलोक पुराणिक के सम्मान समारोह के मौके पर अपनी बात कही। उनकी पूरी वार्ता आप इस लिंक पर पहुंचकर बांच सकते हैं।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210583105987329
ज्ञानजी की कुछ बातों पर अपनी राय मैं अलग से रखूंगा। फ़िलहाल ज्ञानजी के अलगे वक्ता अशोक चक्रधर जी की बातें।
अशोक जी ने अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुये आलोक पुराणिक के बारे में स्नेहिल बुजुर्ग की तरह जमकर स्नेह , आशीष और मंगलकामनाओं की बौछार सी कर दी। आलोक पुराणिक की अनगिनत खूबियां गिनवा डालीं। चक्रधर जी अद्भुत वक्ता हैं। गद्य, पद्य, आशु कविता, व्यंग्य, वक्रोक्ति, तुकबंदी मतलब भाषण के हर फ़न में माहिर। उनको सुनते हुये समय भी अपनी घड़ी बन्द करके कहीं बैठ जाता होगा कि इनके बोलने में खलल न डालो।
आलोक पुराणिक के बारे में बताया कि ये मेहनती बहुत हैं। जैसे ही कोई विचार आता है नोट कर लेते हैं। एक बार बताया आलोक ने कि अशोक जी जो नये-नये शबद प्रयोग करते रहते हैं वो उन्होंने नोट किये है रजिस्टर में। कुछ दिन में 150 नये शब्द जो अशोक चक्रधर ने इजाद किये थे उनको लिखकर दे दिय। ऐसी मेहनत और लगनशील युक्त प्रतिभा हैं आलोक पुराणिक।
आलोक पुराणिक के आर्थिक विषयों पर व्यंग्य लेख लिखने की चर्चा करते हुये अशोक चक्रधर जी ने कहा-’ राजनीति में मंडलीकरण की आंधी चली, फ़िर 1990 में कमंडलीकरण हुआ। इसके बाद जो हुआ आलोक उसको भूमंडलीकरण कर रहे हैं।’
और भी अनेक किस्से अशोक जी ने आलोक पुराणिक के बारे में सुनाये। पूरे पचास मिनट बोले। जरा सा भी बोझिलता नहीं हुई लेकिन बार-बार घड़ी की तरफ़ देखते रहे कि ट्रेन का समय हुआ जा रहा था।
अशोक चक्रधर जी का भाषण समाप्त होते ही सभा बर्खास्त हो गयी।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210609110437424

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'व्यंग्य श्री सम्मान -2017' रपट -7




पिछली रपट पढने के लिये इधर आयें:https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210608601024689
हरीश जी के बाद बोलने का नम्बर आया आलोक पुराणिक का। आलोक पुराणिक ने गोपाल प्रसाद व्यास जी को याद करते हुए बात शुरू की। बताया कि उन्होंने तीस साल पहले गोपाल प्रसाद जी के स्तम्भ 'चकाचक' के साथ एक ही अख़बार में लिखा।
व्यंग्य के बारे में आलोक पुराणिक ने अपनी राय जाहिर करते हुये कहा: "आर्थिक स्थितियों को समझे बगैर आज व्यंग्य लिखना सम्भव नहीं है।"
आज इस मुल्क का हर सफल आदमी कुछ न कुछ बेंच रहा है।
बोरोप्लस ब्यूटी क्रीम मेरी सफलता का राज है कहकर अमिताभ बाजार की जयकार करते हैं।
आलोक जी ने व्यंग्य की परम्परा कबीरदास से शुरु होने की बात की: "कबीरदास शायद पहले व्यंग्यकार थे। वे कहते हैं - सब पैसे के भाई। कबीर जी की रचना में व्यंग्य भी है, अर्थशास्त्र भी है। एक दिन खाना न मिले घर में तो पत्नी इज्जत नहीं करेगी। व्यंग्य बाजार की शक्ल में हमेशा सामने है। "
आलोक पुराणिक की राय में: "आज व्यंग्य लेखन किसी माध्यम का मोहताज नहीं है। अगर आपके लेखन में कुछ दम है तो माध्यम का महत्व नहीँ रखता। अख़बार, पत्रिका, फेसबुक, ट्विटर और माध्यमों में लोग अपना हुनर दिखा रहे हैं।"
बकौल आलोक पुराणिक :"कौन छोटा, कौन बड़ा लेखक इस पचड़े में फ़ंसे बिना अपना काम करते रहते चाहिये। पाठक और समय सबसे बड़ी कसौटी हैं किसी रचनात्मक काम की। मिर्जा ग़ालिब अपने समय में सबसे बढ़िया शायर नहीँ थे। लेकिन आज उनके समय के किसी और शायर को लोग नहीं जानते। काम का महत्व होता है। काम को गम्भीरता से लीजिये। खुद को गंभीरता से मत लीजिये।"
ज्ञान जी का उदाहरण देते हुये आलोक पुराणिक ने कहा: "ज्ञान जी ने कभी व्यंग्य का ज्ञान नहीं बांटा। उन्होंने लिखकर बताया कि अच्छा व्यंग्य क्या होता है। 1991 के बाद के समय के व्यंग्य लेखन का युग इसीलिये मैं ज्ञान युग के रूप में मानता हूँ। उन्होंने काम के बल पर अपनी स्वीकार्यता बताई।"
आखिर में खचाखच भरे सभागार में बैठे श्रोताओं के माध्यम से अपने अनगिनत पाठकों को धमकियाते हुये कहा:"पुरस्कार मिलने के बाद मैं व्यंग्य लिखना कम नहीँ करूँगा।"
आलोक पुराणिक ने 'यक्ष , युधिष्ठर संवाद' और 'आतंकवाद का मोबाईल हल' और 'पापा रिस्टार्ट क्यों न हुए' व्यंग पाठ किया।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210608763948762

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'व्यंग्य श्री सम्मान-2017' -रिपोर्ट -6




पिछली पोस्ट बांचने के लिये इधर आयें https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210607192709482
अगले वक्ता Harish Naval जी थे। हरीश जी के व्यंग्य हमने बहुत कम पढे हैं। खुदा झूठ न बुलवाये हमने उनका सबसे प्रसिद्ध लेख ’बागपत के खरबूजे’ तक अभी नहीं पढा है। हम इसे अपने अकेले की जाहिलियत मानते हुये अफ़सोस प्रकट कर सकते हैं लेकिन फ़लक बड़ा करने की नीयत से हिन्दी साहित्य की कमजोरी के मत्थे का मढने का निर्णय किया है। हिन्दी व्यंग्य के सबसे प्रसिद्ध लेखकों में से एक की सबसे पहली किताब का जिक्र नेट पर नहीं है। न ही उसकी सबसे प्रसिद्ध रचना मौजूद है नेट पर। बताइये आज का पाठक कैसे पहुंचेगे लेखक तक। भले ही उसको ’व्यंग्यश्री’ नहीं ज्ञानपीठ मिल जाये।
हिन्दी साहित्य में लेखक की लोकप्रियता और कद और कालान्तर में उसको मिलने वाले इनामों और प्रसिद्ध की मात्रा उसके उचित प्रकाशक होने की मात्रा के समानुपाती है। (शर्तें लागू)
यह लिखने के पहले हरीश जी की किताब ’माफ़िया जिन्दाबाद’ भी पलट ली यह सोचते हुये कि शायद उसमें यह लेख हो। लेकिन बच गये पढने से। लेख था नहीं उसमें। लेकिन अब जल्दी ही, संभव हुआ तो इसी महीने ही , कम से कम यह लेख जुगाड़कर तो बांच ही लेंगे।
हरीश जी का नाम तो मैंने सुन रखा था। यदा-कदा कुछ लेख भी पढे थे। लेकिन नये सिरे से हमने आलोक पुराणिक के मार्फ़त उनका नाम तब सुना और उनके बारे में जाना जब हरीश जी अपने कैंसर की बीमारी से स्वस्थ होकर वापस आये।
हरीश जी व्यंग्य के त्रिदेवों में से एक माने जाते हैं। ज्ञानजी , प्रेम जन्मेजय जी और हरीश जी को व्यंग्य के त्रिदेव के नाम से ख्यात-कुख्यात करके कई लोगों की टिप्पणियां चलती रहती हैं। हिन्दी साहित्य में शायद रचनाकारों के नाम की तिकड़ी बनाने की परम्परा चली आई है। ’पन्त, निराला, बच्चन’, ’रामविलाश शर्मा, अमृतलाल नागर, केदार नाथ अग्रवाल’, ’कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव , मोहन राकेश’, ’परसाई, शरदजोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी’ की तिकड़ी की तर्ज पर ही शायद लोगों ने ’ज्ञान,प्रेम,हरीश’ जी की तिकड़ी का अविष्कार किया। मजे की बात इस काल्पनिक तिकड़ी से नाराज रहने वाले लोग भी हरीश जी को सबसे शरीफ़ व्यक्ति और व्यंग्यकार भी मानते हैं।
मुझे लगता है कि हरीश जी इस मामले में संगदोष के हादसे के शिकार हुये। प्रेम जी के साथ अध्यापन करते हुये, उसी समय में लिखते हुये, उनके साथ एक ही कालोनी में रहते हुये उनको जबरियन इन त्रिदेवों में शामिल कर लिया गया। साहित्य सेवा के लिये इतनी जबरदस्ती तो चलती है।
अपने स्तर पर हरीश जी इस काल्पनिक गठबंधन को तोड़ने की हर संभव कोशिश करते रहते हैं। उन्होंने ’परसाई, जोशी, त्यागी ’ का जिक्र करते हुये उसमें श्रीलाल शुक्ल जी को शामिल कर दिया। ’ज्ञान, प्रेम , हरीश के जिक्र में सुरेशकांत आदि को जोड़ा ( कुछ व्यंग्य की/ कुछ व्यंग्यकारों की -हरीश नवल पेज 16-17)|
बहरहाल हिन्दी व्यंग्य के इन बुजुर्गों में से हरीश जी ही हैं जिनसे मैं जब मन आता है फ़ोन पर बात कर लेता हूं। वे भी सहजता से मुझसे बात कर लेते हैं। इसलिये मुझे वे अच्छे लगते हैं। प्यारे भी। जब-तब मेरी किसी भी पोस्ट पर आशीर्वाद भी देते रहते हैं। उनके इसी प्यार के चलते हम उनकी इस बात का भी बिल्कुल बुरा नहीं मान रहे हैं कि उन्होंने इधर के उभरे व्यंग्यकारों में मेरा उल्लेख नहीं किया। मुझे अच्छे से पता है कि जब भी मैं ऐसा कभी लिखूंगा तब ही वे मुझे बता देंगे-’ अरे अनूप भाई, तुम्हारा लेखन तो उन सबसे एकदम अलग तरह का है। तुम्हारे बारे में आदि-इत्यादि में क्या लिखना। अलग से लिखेंगे कभी।’ 
हरीश जी के मन में आलोक पुराणिक के लिये बेहद स्नेह है। आलोक पुराणिक के कई मामलों में सीनियर हैं हरीश जी। पांच साल पहले 2012 में हरीश जी को भी व्यंग्य श्री सम्मान से सम्मानित किया गया। आज उनके संस्मरण पढते हुये पता चला कि हरीश जी पिता जी को खोने के मामले में भी सीनियर हैं। आलोक जी के पिताजी का जब निधन हुआ था तब वे 8 साल के थे। हरीश जी ने यह हादसा 5 साल की उमर में झेला जब उनके पिताजी 32 साल की उमर में नहीं रहे। समान दुख भी शायद दोनों के बीच स्नेह का एक कारक हो।
बहरहाल यह सब तो ऐसे ही। हरीश जी जब आलोक के बारे में बोलने के लिये खड़े हुये तो उन्होंने व्यंग्य के बारे में अपनी राय से बात शुरु की।
हरीश जी ने कहा: "व्यंग्य लिखना बहुत कठिन काम है। व्यंग्यकार का काम कठिन होता है। हास्य निर्मल होना चहिये। व्यंग्य को ठीक ढर्रे पर चलाने के लिए बहुत सामर्थ्य चाहिए होती है।"
आलोक पुराणिक के बारे में अपनी राय व्यक्त करते हुये हरीश जी ने कहा:
" आलोक पुराणिक आर्थिक विषयों पर समर्थ व्यंग्य लिखते थे। उनके अलग तरह के व्यंग्य जब हमने देखे तब चकित हुए। मिले तो तबसे साथ है। लेखन के लिए निरन्तरता बहुत आवश्यक है। आलोक व्यंग्य निरन्तर लिखते हैं।"
हास्य और व्यंग्य का अंतर रेखांकित करते हुये हरीश जी बोले: "हास्य और व्यंग्य में उतना ही अंतर है जितना लाभ और हानि में, जीवन और मृत्यु में होता है। जिन व्यंग्यकारों के लेखन में हास्य कम होता है वह बोझिल हो जाता है। जिस व्यंग्य में हास्य की अधिक होता है वह व्यंग्य कमजोर हो जाता है। आलोक पुराणिक तकनीकी विषयों पर लिखते हैं। आर्थिक विषयों पर गंगाधर गाडगिल लिखते थे। अब आलोक लिखते हैं। उनका कोई सानी नहीं है।"
रवीन्द्रनाथ त्यागी की यादों को साझा करते हुए हरीश जी ने रोचक किस्से सुनाये। एक बार त्यागी जी का भाषण हरीश जी ने अपने विद्यालय में आयोजित कराया। कालेज गोष्ठी में उन्होंने मुझे (हरीश नवल), प्रेम जन्मेजय, सुभाष चन्दर आलोक पुराणिक सबको कंडम कर दिया। इसका किस्सा सुनाते हुये हरीश जी ने बताया:
" हिन्दी व्यंग्य लेखन पर जब त्यागी जी वक्तव्य देते हुये जब वे हमारी पीढी , जो 1975 से प्रकाश में आई थी , पर बोलने लगे, मैं जो उनके साथ मंच पर बैठा था, पुलकित हो रहा था कि वे मेरे विद्यार्थियों और सहकर्मियों के समक्ष मेरे व्यंग्य-लेखन का प्रशस्ति पत्र पढेंगे, मेरे विगत के पच्चीस वर्षों के अनवरत अवदान की चर्चा करेंगे... परन्तु वे तो हमारी पीढी के विषय पर मात्र एक वाक्य बोलकर हमसे अगली पीढी में पहुंच गये, जहां उन्होंने आलोक (पुराणिक) और सुभाष (चन्दर) के नाम नहीं लिये। वाक्य था-’आपके हरीश नवल की पीढी में केवल ज्ञान चतुर्वेदी लिख रहा है और अच्छा लिख रहा है। इस पीढी में हां थोड़ा बहुत प्रेम जनमेजय और हरीश नवल ने भी लिखा है।
इस वक्तव्य के बाद में एक शोधकत्री को बातचीत में त्यागी ने व्यंग्य की सत्ता स्थापित करने में मेरा (हरीश नवल) , प्रेम जनमेजय, सुभाष चन्दर और आलोक पुराणिक का नाम लिया।
बाद में इसका कारण बताते हुये त्यागी जी ने बताया -’मैं तुमसे और प्रेम से नाराज हूं और ज्ञान से खुश क्योंकि वो निरंतर लिख रहा है। तुम लोग लिख सकते हो लेकिन लिख नहीं रहे इसलिये मैंने ऐसा कहा।"
हरीश जी ने त्यागी जी का जो संस्मरण सुनाया उससे मुझे बुजुर्ग व्यंग्यकारों के सार्वजनिक वक्तव्य में और व्यक्तिगत बातचीत में अन्तर का कारण पता चला। परम्परा चली आ रही है। उसका पालन हो रहा है। तारीफ़ की डबल एकाउंटिंग का मामला है।
हरीश जी ने एक जगह लिखा भी है -" व्यंग्यकार वहां होता है जहां पाखंड है, झूठ है , फ़रेब है।"
इसलिये तारीफ़ के बारे में हमको व्यंग्य बाबा आलोक पुराणिक की बात सही जान पडती है (https://www.facebook.com/shashikantsinghshashi/posts/1491667200852787): "शशिजी चर्चाओं (तारीफ़/बुराई) पर कभी मत जाइये, कभी भी नहीं। अपने काम को अपने हिसाब से बेहतरीन तरीके से अंजाम देते जाइये।"
हरीश जी ने सुभाष चन्दर जी से आह्वान किया कि सुभाष जी जब अगली बार लिखें तो आलोक पुराणिक पर अलग से लिखें। आलोक पुराणिक को आर्थिक लेखक के रूप में जाना जाता है।
अख़बारों में जो लिखा जा रहा है। वह सब साहित्य नहीं हैं। ऐसे ही जो पत्रिकाओं में लिखा जा रहा है वह सब भी साहित्य नहीं है।
हरीश नवल जी ने व्यंग्य श्री सम्मान के कर्ता-धर्ता गोविन्द व्यास जी के बारे में कहा -"गोविन्द व्यास जी गोपाल प्रसाद व्यास की यादों को अच्छे से संजो रहे हैं। "

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210608601024689

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'व्यंग्य श्री सम्मान -2017' रिपोर्ट-5



इसके पहले की रिपोर्ट पढने के लिये इधर आयें :https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210605340023166
आलोक पुराणिक को सम्मानित किये जाने के पहले उनकी तारीफ़ का इंतजाम भी किया गया था। वैसे तो काम भर की तारीफ़ नीरज बधवार ने कर ही दी थी। लेकिन फ़िर भी यह बताने के लिये आलोक पुराणिक वाकई इनाम के काबिल हैं किसी ऐसे व्यक्ति से तारीफ़ करवाने का सोचा गया जिससे कि आलोक पुराणिक को भी लगे कि वे वाकई इनाम के काबिल हैं। राजधानी में ऐसे काम के लिये सुभाष चन्दर से बेहतर और कौन हो सकता है? नहीं हो सकता न !
तो नीरज बधवार ने आलोक पुराणिक का परिचय कराने के लिये सुभाष जी को बुलाया।
सुभाष जी को बुलाने का कारण एक यह भी था कि नीरज को अच्छी तरह पता था कि पिछले साल सुभाष जी को जब व्यंग्य श्री सम्मान मिला था तो आलोक पुराणिक ने उनकी जमकर और जमाकर तारीफ़ की थी। आप भी देख लीजिये कि आलोक पुराणिक ने सुभाष चन्दर के बारे में गये साल क्या कहा था:
" प्रख्यात व्यंग्यकार और हिंदी व्यंग्य के एकमात्र व्यवस्थित इतिहासकार सुभाष चंदरजी 13 फरवरी, 2016 को व्यंग्य-श्री से सम्मानित होंगे। सुभाषजी को बधाई, शुभकामनाएं। व्यंग्य-श्री सम्मान प्रख्यात हास्य-व्यंग्य व्यक्तित्व स्वर्गीय गोपाल प्रसाद व्यासजी से जुड़ा सम्मान है, इसलिए सम्मानों, पुरस्कारों की भीड़ में इस सम्मान की अलग ही चमक है।
सुभाषजी के हमारे जैसे चाहकों के लिए यह बहुत ही खुशी का अवसर है। हिंदी व्यंग्य के एकमात्र व्यवस्थित इतिहासकार, व्यंग्य की बारीक समझ नयी पीढी तक सौहार्द्रपूर्वक पहुंचानेवाले सुभाषजी व्यंग्य के विलक्षण व्यक्तित्वों में से एक हैं। आदरणीय ज्ञान चतुर्वेदीजी ने अभी कुछ दिन पहले अपने एक वक्तव्य में एक बात कही थी कि लोग बूढ़े हो जाते हैं, बड़े नहीं होते।
व्यंग्य में भी बड़े लोगों की सख्त कमी है। सुभाषजी व्यंग्य में बहुत कम बचे बड़ों में से एक हैं, जिन्होने व्यंग्य की नयी पीढ़ी को बहुत सिखाया है। मैंने व्यक्तिगत तौर पर सुभाषजी से बहुत कुछ सीखा है। व्यंग्य की एक पूरी पीढ़ी ही सुभाषजी के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करती है। " बयान खुद देखना चाहें तो इधर पहुंचें। यहां आपको और शुभकामनाओं के फ़ुदने भी दिख जायेंगे: https://www.facebook.com/puranika/posts/10153431183973667
मजे की बात आलोक पुराणिक पिछले साल भी मंच पर मौजूद थे। अलबत्ता कुछ बढे वजन के साथ। उनको लगा होगा इस साल नहीं तो अगले साल नहीं तो अगले साल अपन को भी यह व्यंग्य श्री सम्मान मिलना ही है तो उसके लिये अपने को क्यों न तैयार कर लिया जाये। वजन के चलते मंच पर चढने में होने वाली परेशानी का अंदाज लगाया और बदन का वजन लेखन पर तबादलित करके स्लिम-ट्रिम हीरो टाइप हो गये।
हां तो बात हो रही थी सुभाष जी के वक्तव्य की। सुभाष जी ने माइक संभालते हुये सामने, दायें , बायें और मंच की तरफ़ देखा और आलोक पुराणिक के बारे में बोलने लगे। बोलना क्या शुरु किया एकदम आलोक पुराणिक के लिये धुंआधार तारीफ़ी गोलों की बौछार शुरु कर दी। किसी को संभलने का मौका तक नहीं दिया। ऐसा लगा जैसे मन में बने आलोक पुराणिक की प्रशंसा के बांध के सारे फ़्लड गेट एक साथ खोल दिये हों। तारीफ़ के गेट के साथ मन भी खोल दिया। खुले मन से भरपूर तारीफ़ की।
सुभाष चन्दर ने आलोक पुराणिक के बारे में बोलते हुये कहा : ”आज के समय का समय का व्यंग्य का सबसे लोकप्रिय नाम आलोक पुराणिक है। 150 साल के व्यंग्य के इतिहास में अगर 10 व्यंग्य स्तंभकारों के नाम लिए जाएँ तो आलोक पुराणिक को शामिल किये बिना कोई रह नहीं सकता।
आलोक पुराणिक की खासियत बताते हुये सुभाष जी बोले: “आलोक पुराणिक के सबसे लोकप्रिय व्यंग्यकार होने के तीन कारण हैं:
(1) व्यंग्य में उनका जनोन्मुखी तेवर
(2) भाषा को लेकर बेहद सजगता
(3) और लगातार नए प्रयोग
इन तीन बातों के लिए आलोक को मैं जानता हूँ। ये आलोक की विशेषतायें हैं। यही बातें उनको आज के समय का सबसे लोकप्रिय व्यंग्यकार बनाती हैं।
इसके बाद कल्लू मामा ने सोचा कि अब जब तारीफ़ हो ही रही है तो कायदे से हो जाये। उन्होंने तारीफ़ की पतंग और ऊंची उडाते हुये कहा-“ हममें से अधिकांश लोगों को आलोक पुराणिक की लेखन जलन है।
आलोक पुराणिक कई अखबारों लिखते हैं। आलोक लिखने के पहले खूब सारा पढते हैं। पढे हुये को गुनते हैं। तब लिखते हैं। आलोक में नए प्रयोगों को करने की भरपूर ललक है। आजकल फोटो व्यंग्य लेखन का काम शुरु किया है। नये-नये प्रयोग करना आलोक की खासियत हैं।“
सुभाष चन्दर को आमने-सामने बोलते हुये शायद पहली बार सुना। जिस अवगुंठित और उदार मन से उन्होंने आलोक पुराणिक की तारीफ़ की उसको सुनकर मन खुश हो गया। कोई अगर-मगर नहीं, कोई किन्तु-परन्तु नहीं। जब तारीफ़ हो रही है तो सिर्फ़ तारीफ़ होगी। मानो उन्होंने मन के साफ़ निर्देश दे रखा हो- “प्रसंशा के अलावा और कोई भाव सामने दिख गया तो बोलेंगे तो बाद में पहले खाल खैंच लेंगे वहीं मंच पर खड़े-खड़े।“ मन को जैसा निर्देश दिया था कल्लू मामा ने वैसे ही उदार भाव सप्लाई करता दिमाग को बोलने के लिये।
आलोक पुराणिक के व्यंग्य लेखन की खासियत का जिक्र करते हुये सुभाष जी ने कहा -“व्यंग्य में बाजार की घुसपैठ को सबसे पहले आलोक पुराणिक ने पहचाना। बाजारवाद का ऊंट सबसे बेहतर तरीके से जिस व्यक्ति ने सबसे पहले पकड़ा उसका नाम आलोक पुराणिक है। “
आलोक पुराणिक की भाषा के चुनाव की तारीफ़ करते हुये कहा- “आलोक ने वो भाषा चुनी जिसमें आलोक की विदत्ता हो तो लेकिन उसकी चकाचौंध न हो। आम आदमी की भाषा में लिखा। युवा उनके पाठको में युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा है।“
आलोक पुराणिक के बारे में फ़िनिशिंग टिप्पणी करते हुये सुभाष चन्दर ने बोले: “बालमुंकद गुप्त, गोपालप्रसाद व्यास, शरद जोशी की तरह का व्यंग्य लेखन स्तम्भ कार हैं आलोक पुराणिक।“
हम सामने दर्शकों के बीच सर उठाये हुये और आलोक पुराणिक बेचारे विनम्रता से सर झुकाये हुये सुभाष चन्दर को बोलते हुये सुनते रहे। सुभाष जी का आलोक पुराणिक के बारे में बयान एक ईमानदार बयान लगा। लग रहा था दिल से कोई शुभचिंतक बोल रहा है। मन खुश हुआ शुरुआती तारीफ़ सुनकर। अगर रुकना होता तो सुभाष जी के इस वक्तव्य के लिये उनको चाय पिलाते। भले ही पैसे हमारे ही ठुकते।
सुभाष जी के वक्तव्य के बाद आलोक पुराणिक का सम्मान हुआ। तिलक, माला, शाल, वाग्देवी की प्रतिमा और लखटकिया चेक थमाया गया। इसके बाद हरीश नवल जी को आशीर्वाद देने के लिये बुलाया गया।

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