Sunday, October 22, 2017

घोड़े, नाल और एल्गिन मिल

पंकज बाजपेयी से मुलाकात करके लौटे डिप्टी का पडाव की तरफ़ से। तिराहे से घंटाघर की तरफ़ बढे तो एक जगह कुछ घोड़े दीवार के पास खड़े थे। दीवार पर हकीम उस्मानी का इश्तहार छपा था - ’सेक्स रोगी मिलें, मंगलवार, ढकनापुरवा।'
हमें लगा शायद घोड़े भी यौन समस्यायों से जूझते होंगे। नामर्दी की तर्ज पर उनमें नाघोड़ापन की बीमारी होती होगी। लेकिन उनके हकीम अलग होते होंगे। होने ही चाहिये।
सामने फ़ुटपाथ पर एक घोड़े के राश थामें एक बुजुर्ग बैठे थे। घोड़े की उमर बताई सात साल। जब लिया था तब 35 हजार का पड़ा था। अब कीमत एक लाख होगी। नाम कुछ रखा है पूछने पर बताया -’ यह अभी तक बेनाम है।’
घोडे के उपयोग के बारे में बताया शाम को बरातों में किराये पर जाता है। 1500 रुपये बारात किराया। दिन में बोझा ढोता है। मिट्टी, मौरम, ईंटे जो काम मिल जाये। छह सात सौ निकल आते हैं इससे। दाना-पानी में दो-तीन सौ रूपया खर्च हो जाता है।
बगल में ही घोड़े के नाल लगाने वाले अपनी दुकान सजा रहे थे। कुछ नाल और नाल में लगने वाली कीलें धरीं थीं। नाल एक बोरे पर और कीलें एक टायर के टुकड़े पर धरी थीं। कीलों का मत्था आयताकार और खोखला था। एक नाल में चार कील ठुकती हैं। चार पैरों की नाल 160 रुपये में लगती हैं।
नाल लगाने वाले शब्बीर ने बताया कि चालीस से यह काम कर रहे हैं। 65 के ऊपर उमर है। छावनी में रहते हैं। कुछ काम यहां वहां भी मिल जाता है। नाल लगाने का काम कम होता जा रहा है। दिन भर में ढाई-तीन सौ की कमाई हो जाती है। एक सेट नाल हफ़्ते भर चल जाती है। कोई-कोई घोड़ा जल्दी भी खराब कर देता है। एक बड़ी नाल संवारते हुये बताया - ’यह नाल उस घोड़े लगनी है। बग्घी लेकर जायेगा घोड़ा फ़तेहपुर।’
दोनों घोड़े सामने अलग-अलग नांद में चारा खा रहे थे। रंग एकदम सफ़ेद। एक का नाम वीरू दूसरे का शेरा। हमें लगा दूसरे का नाम जय होता शोले की तर्ज पर। लेकिन शायद अगले ने शोले देख रही हो और पता हो कि जय उसमें निपट जाता है इसी लिये उसका नाम जय नहीं रखा। वीरू और शेरा को देखकर लगा कि वे घोड़ों की दुनिया में हैंडसम कहे जाते होंगे। घोड़िया उनकी दुलकी चाल पर मरती होंगी। क्रश भी होता होगा कुछ का। उनकी दुनिया में फ़ेसबुक तो होता नहीं जो उनके स्टेटस से उनके भाव पता कर लें। हम तो केवल अनुमान ही लगा सकते हैं। धूमिल ने शायद अपनी अन्तिम कविता में कहा भी है:
’लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है।’
लेकिन हम की भाषा तो जानते नहीं लिहाजा शब्बीर से ही बतियाते रहे। शब्बीर ने बताया उनके कोई बच्चा नहीं है। एक लड़की गोद ली थी। उसकी शादी करके घर बसा दिया। अब मियां-बीबी दो लोग अपना गुजर बसर करते हैं।
शब्बीर से याद आया कि शब्बीर माने प्यारा होता है। शब्बीर का यह मतलब हमारे मित्र मो.शब्बीर ने बताया था। उनका नाम हमारे मोबाइल में ’शब्बीर माने लवली’ के नाम से सुरक्षित है। ये वाले शब्बीर घोड़े की नाल लगाते हैं। हमारे वाले Shabbir कानपुर में बहुत दिन तक 'मैग गन' बनाते रहे। आजकल कलकत्ता में हैं। पूछेंगे क्या बना रहे हैं अब।
आगे सामने की दीवार के पास कुछ और घोड़े खड़े थे। दीवार पर बबासीर, भगन्दर और हाइड्रोसील के इलाज का बोर्ड लगा था। डॉ अलबत्ता बदल गये थे। हकीम उस्मानी की जगह डॉ अनिल कटियार ने ले ली थी। घोड़ों में पता नहीं ये बीमारियां होती कि नहीं।
बगल में एल्गिन मिल का गेट था। कभी यहां हज्जारों लोग काम करते थे। तब कानपुर में दसियों मिलें चलतीं थीं और उनके कारण कानपुर पूरब का मैनचेस्टर कहलाता था। लेकिन धीरे-धीरे मालिकों की नीतियों, ट्रेड यूनियनों की हठधर्मी और तत्कालीन सरकारों की उदासीनता और शायद उस समय कोई सर्वमान्य कनपुरिया नेता न होने के कारण कभी पूरब का मैनचेस्टर कहलाने वाला शहर कुली-कबाड़ियों के शहर में तब्दील होता चला गया।
कलीम नया घोड़ा लाये हैं 65 हजार में। उनका बेटा कक्षा 6 की पढाई छोड़कर इसी धन्धे में आ गया। बोला - ’पढने में मन नहीं लगता।’ एक और आमीन मिले। बोले- ’सुबह से शाम तक यहीं रहते हैं। घर केवल सोने के लिये जाते हैं।’ चार बच्चे हैं। पैंतीस साल की उमर है। हमने कहा - पान-मसाला इत्ता क्यों खाते हो? बोले आदत हो गयी। घर जाते हैं तब नहीं खाते।
सारे घोड़े-खच्चर अपनी दिहाड़ी के लिये तैयार हो रहे थे। धूप तेज हो रही थी। हम भी वापस चल दिये।
सबेरे का किस्सा यहां बांचिये
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