Thursday, October 26, 2017

आज रपट जाएं तो


आज सबेरे निकले तो साइकिल मारे खुशी के लहराती हुई चल दी। टहलने की खुशी इतनी कि जरा सा पैडल मारते ही सरपट बढ गयी। सामने से स्कूल का बच्चा आ रहा था। हमने ब्रेक मारा। ब्रेक भी मारे कर्तव्यपरायणता के इत्ती जोर से लगा कि साइकिल रपटते हुये बची। ये तो कहिये कि ’पैर ब्रेक’ लगा के रोका गाड़ी को वर्ना साइकिल सहित सड़क पर गिरने के बाद गाना गाते रहते:
आज रपट जायें तो हमें न बचईयो
हमें जो बचईयो तो खुद भी रपट जईयो।
पप्पू की चाय की दुकान गुलजार थी। गोल टोपी लगाये एक आदमी बेंच पर आलथी-पालथी मारे बैठे सामने वाले से बतिया रहे थे। चाय का आखिरी घूंट पीने के बाद दोनों हाथ मिलाकर चल दिये। सामने अधबने ओवरब्रिज ने हमको गुडमार्निंग की।
मोड के आगे एक झोपड़ी के आगे कुछ बकरियां बंधी थीं। एक बकरी ठेलिया पर रखे प्लास्टिक के अधकटे ड्रम में मुंडी घुसाये पानी पी रही थी। जब तक हम जेब से कैमरा निकालकर फ़ोकस करें तब तक ’बदमाश बच्ची बकरी’ ( ब वर्ण की आवृत्ति के चलते अनुप्रास अलंकार है इसमें) अपने अगले पैर ड्रम से हटाकर, मुंडी बाहर करके ठेलिया से कूदकर तिड़ी-बिड़ी हो गयी।
पुल पर आवाजाही शुरु हो गयी थी। बीच पुल एक ऑटो वाला अपने ऑटो का ’पंक्चर पहिया’ बदल रहा था। गाना बज रहा था:
मोहे आई न जग से लाज
मैं इतना जोर से नाची आज
कि घुंघरू टूट गये।
वहीं खड़े होकर सोचा क्या ऑटो के पहिये पैर के घुंघरू के तरह होते हैं। सड़क पर ऑटो चलना नाचने सरीखा होता है?
पुल के नीचे देखा कि लोग बालू में कोई मंडप सरीखा बना रहे थे। शायद छठ पूजा के लिये। लेकिन भीड़ बहुत कम थी छ्ठ पूजा के लिहाज से। शायद पूरब की तरफ़ के लोग कम रहते हैं यहां। आर्मापुर में पूर्वी उत्तर प्रदेश , बिहार के लोग खूब रहते हैं। नहरिया किनारे खूब भीड़ होती है छठ के दिन।
पुल पर ही एक आदमी अपना टीम-टामड़ा समेटे समेटे जिस तरह तरह चला जा रहा था उससे दुष्यन्त कुमार की ये लाइने याद आ गईं:
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिदुस्तान है.
शुक्लागंज की तरफ़ से गंगा तट पर जाते हुये देखा चुनाव प्रचार के लिये लगे पोस्टर बैनर लगे थे। हरेक में महिला प्रत्याशियों के पहले उनके पति या फ़िर देवर का नाम छपा था। मने पत्नी के चुनाव के पति और भाभी के चुनाव के लिये देवर का जिक्र जरूरी लगा चुनाव लड़ने के लिये।
कोने में एक ठेका भांग का मिला। उसमें अनुज्ञापी का संतोष त्रिवेदी लिखा था। हमने फ़ोटो खैंच लिया दिखाने के लिये संतोष त्रिवेदी को और पूछने के लिये भी कि ये भी करते थे क्या?
आगे एक जगह एक लड़का साइकिल पर ग्राइंडर लगाये कैंची-चाकू पर धार लगा था। बताया कि बाप-दादे भी यही धंधा करते थे। खपरा मोहाल (स्टेशन के पास) में रहता है बालक दीपू। एक चक्कू पर धार लगाने के पांच रुपये लेता है। किसी के पास नहीं होता है तो कम भी ले लेता है। बताया कभी तीन-चार सौ कमाई हो जाती है, कभी सौ-दो सौ। पुस्तैनी धंधा अपनाने के पीछे कारण बताया - ’पिताजा करते थे तो हम भी करने लगे। कोई पेट से तो सीखकर नहीं आता।’
पढाई-लिखाई बिल्कुल नहीं की है दीपू ने। हमने कहा अब पढ लो, यहां आया करो इतवार को पढने। बच्चे पढाते हैं। वह बोला- ’हम सुबह निकल जाते हैं फ़ेरी लगाने। पढने के लिये कहां आयेंगे इत्ती दूर।’
गंगा दूर खिसक गयीं थीं। जहां महीने भर पहले पानी थी वहां अब बालू का कब्जा हो गया था।
लौटते हुये क्रासिंग के पास एक बच्चा साइकिल पर अपनी बहन को करियर पर स्कूल छोड़ने जाते दिखा। बच्ची का नाम कनिका और बच्चा लकी। बहन को भेजने के बाद बच्चा भी जायेगा स्कूल। बच्चों की फ़ोटो खींचते देख गोद में बच्चा लिये एक महिला बोली- ’का अखबार मां छपयिहौ फ़ोटू?’ हम महिला के सवाल के जबाब के बहाने उनसे बतियाने लगे।
पता चला कि जिस चाय की गुमटी के सामने खड़ी थी वो उनके मियां की थीं। नाम खुला उदित। महिला का नाम ऊषा। नाम हंसते हुये बताया तो संगत करने को कविता यादों के कबाड़खाने से फ़ुदकती हुई सामने आ गयी:
उषा सुनहले तीर बरसती
जय लक्ष्मी सी उदित हुई।
लगा कि देखो - ’उषा और उदित के नाम से कविता कित्ते पहले लिख गये हैं महाकवि। किसी को क्या पता था कि दोनों कानपुर के कैंट इलाके में चाय की दुकान पर भेंटायेंगे कभी।’
पास की ही एक झोपड़ी में रहते हैं। कानपुर में चाय की दुकान करने के पहले उदित अम्बाला में सब्जी बेंचने का काम करते थे। अम्बाला बहुत पसंद है ऊषा को। बोली कानपुर बहुत गंदा शहर है। पास बैठे चाय ग्राहक ने बताया कि कानपुर से गंदगी कभी खत्म न होगी। लेकिन कनपुरिया होने के चलते शहरप्रेम का मुजाहिरा करते हुये बोला- ’ जो एक बार कानपुर रह लेता है वह कभी यहां से जाना नहीं चाहता। यहां बहुत मद्दे में गुजारा हो जाता है आदमी का।’
कानपुर और कलकत्ते दोनों ही इस बात के लिये जाने जाते हैं। गरीब आदमी के गुजारे के लिये दोनो शहर सहज-शरणदाता हैं।
गोद में बच्चा लिए थीं उषा। बताया -'नाती है। साल भर का हो गया। '
तीन लड़के हैं। सब दिहाड़ी मजूरी करते हैं।
उदित ने बताया कि अम्बाला में सब्जी बेंचने का काम बढिया था।।लोग सब्जी खूब खरीदते थे। अच्छी आमदनी थी। कानपुर में आदमी दस रुपये में घर भर की सब्जी खरिदना चाहता है। सुबह रोज मंडी जाकर सब्जी लाना लफड़े का काम इसीलिए अब चाय की दुकान ही चला रहे हैं।
ऊषा सुबह उठकर अपने मियां की दुकान पर चाय लेते आयी थीं। मोमियां की थैली में चाय लेते हुये बोली - ’चाय बहुत बढिया बनाते हैं ये।’
हमें याद आया कि चाय तो हम भी बहुत बढिया बनाते हैं। लेकिन हमारे मानने से क्या होता है? पीने वाला कहे तब न ! हम रोज सुबह की चाय बनाते हैं लेकिन अक्सर ही कहा जाता है-’ बढिया चाय पिलाओ फ़िर चला जाये।’
लौटते हुये सड़क एकदम गुलजार हो गई थी। सूरज भाई एकदम ऊपर पहुंचकर चमकने लगे थे। सुबह हो गयी थी। आज छुट्टी होने के चलते सुबह और खुशनुमा लग रही थी।

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